आधुनिक भारत का दलित आंदोलन | Adhunik Bharat Ka Dalit Andolan0

By: आर. चंद्रा - R. Chandra कन्हैयालाल चंचरीक - Kanhaiyalal Chancharik


दो शब्द :

यह पाठ दलित समाज और उनके उत्थान के संघर्ष के इतिहास पर केंद्रित है। इसमें दलितों के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उनके मुक्तिदाताओं जैसे फुले और अम्बेडकर, और विभिन्न दलित आंदोलनों का विवरण दिया गया है। दलित मुक्ति संग्राम को नवजागरण की देन बताया गया है, जिसमें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान सामाजिक-जातीय चेतना और शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। फुले ने महाराष्ट्र में दलितों के बीच नवचेतना का बीज बोया, जो आगे चलकर अम्बेडकर के माध्यम से एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले लिया। पाठ में यह भी बताया गया है कि कैसे इतिहासकारों ने दलित आंदोलन का एकपक्षीय अध्ययन किया है और उत्तर भारत के राष्ट्रवादी दलित नेताओं जैसे जगजीवन राम की उपेक्षा की है। यह बताया गया है कि भारत में दलित जातियों का इतिहास अस्पृश्यता और सामाजिक विषमताओं से भरा रहा है, और कैसे आर्य संस्कृति के आगमन के साथ ही उनके जीवन में कठिनाइयाँ बढ़ीं। बौद्ध धर्म के उदय के समय दलितों को कुछ सम्मान मिला, लेकिन बौद्ध धर्म के पतन के साथ ही उनके अधिकारों में कमी आई। पाठ में यह भी उल्लेख है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के काल में समाज में जातिभेद और असमानता का अध्ययन किया गया, जिससे दलितों की स्थितियों का और अधिक विश्लेषण हुआ। अंत में, यह स्पष्ट किया गया है कि दलितों के संघर्ष का इतिहास भारतीय समाज की सामाजिक संरचना में गहराई से जुड़ा हुआ है।


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