हिंदी को मराठी संतों की देना | Hindi ko Marathi Santon ki Den

By: आचार्य विजयमोहन शर्मा - Aacharya Vijaymohan Sharma
हिंदी को मराठी संतों की देना | Hindi ko Marathi Santon ki Den by


दो शब्द :

यह पाठ भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित है, जिसमें तीर्थ स्थानों और संतों के योगदान का उल्लेख किया गया है। भारत एक कृषि-प्रधान और तीर्थ-प्रधान देश है, जहाँ अनेक तीर्थ स्थल हैं जहाँ साधु-संतों का समय-समय पर समागम होता है। इन अवसरों पर साधु संतों के ज्ञान और भक्ति की चर्चा होती है, जिससे न केवल श्रद्धालुओं को लाभ होता है, बल्कि साहित्य को भी समृद्धि मिलती है। पाठ में यह बताया गया है कि संतों की संगति और विचार-विनिमय से आध्यात्मिक साहित्य की वृद्धि हुई है और भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी में, इसका प्रभाव पड़ा है। संतों ने भाषा के माध्यम से लोकमानस की चेतना को जागृत करने का कार्य किया है। संतों की वाणी ने विभिन्न भाषाओं के साहित्य को समृद्ध किया है और हिंदी को विशेष रूप से इसका लाभ मिला है। लेखक आचार्य बिनयमोहन शर्मा ने इस ग्रंथ के माध्यम से हिंदी और मराठी के बीच के संबंधों, संतों की जीवन यात्रा, और उनके द्वारा हिंदी में किए गए योगदान का विस्तार से वर्णन किया है। इस ग्रंथ में संतों की रचनाएँ और उनके विचारों का संग्रह किया गया है, जिससे हिंदी साहित्य का भंडार और भी समृद्ध होता है। अंत में, लेखक ने संतों के योगदान को अमूल्य बताया है और आशा व्यक्त की है कि यह ग्रंथ हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान पाएगा। यह ग्रंथ संतों के विचारों और उनके द्वारा हिंदी को मिली प्रेरणा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।


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