कबंला | kabanla

- श्रेणी: उपन्यास / Upnyas-Novel साहित्य / Literature
- लेखक: प्रेमचंद - Premchand
- पृष्ठ : 200
- साइज: 14 MB
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दो शब्द :
इस पाठ में प्रेमचंद ने कबला संग्राम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके महत्व पर चर्चा की है। वे बताते हैं कि इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ साहित्यिक कल्पना को हमेशा प्रेरित करती रहती हैं। हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के इतिहास में ऐसे महत्वपूर्ण संदर्भ मौजूद हैं, जैसे रामायण, महाभारत और कबला का संग्राम। प्रेमचंद का मानना है कि भारतीय साहित्य में कबला पर अब तक कोई नाटक नहीं लिखा गया, जबकि यह एक महत्वपूर्ण विषय है। वे इस बात पर भी प्रकाश डालते हैं कि हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य का एक कारण यह है कि हिंदू मुस्लिम महापुरुषों के सच्चे चरित्रों से अनभिज्ञ हैं। वे यह भी कहते हैं कि नाटक का मुख्य अंग उसकी भाव-प्रधानता है, और दर्शक की रुचि से उसके अच्छे या बुरे होने का निर्धारण नहीं किया जा सकता। नाटक की पहली दृश्य में कूफा की जामा मस्जिद का दृश्य प्रस्तुत किया गया है, जहाँ विभिन्न पात्र आपस में संवाद कर रहे हैं। यहाँ मुस्लिम, सुख़्तार, सुल्तान मान और हानी जैसे पात्र हैं, जो ज़ियाद के शासन और उसकी नीति के बारे में बात कर रहे हैं। मुस्लिम लोगों को इस्लाम के सच्चे दोस्त के रूप में पेश करते हैं, जबकि ज़ियाद की नीति को धोखाधड़ी मानते हैं। इस नाटक में मुस्लिम की स्थिति, उसकी पहचान, और उसे दी जा रही धमकियों का भी वर्णन है। मुस्लिम अपने विचारों को व्यक्त करता है और अपने लोगों को चेतावनी देता है कि जुल्म और अत्याचार के खिलाफ खड़े होना जरूरी है। अंत में, मुस्लिम अपनी जान की परवाह किए बिना अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है और अपने समुदाय को एकजुट होने के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार, प्रेमचंद ने अपने नाटक के माध्यम से न केवल ऐतिहासिक घटनाओं को उजागर किया है, बल्कि मानवता, धर्म और समाज के प्रति एक गहरा संदेश भी दिया है।
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