दो शब्द :

इस पाठ में समय और जीवन के क्षणभंगुरता के बारे में विचार किया गया है। लेखक ने यह बताया है कि सूर्य के उदय और अस्त के साथ मनुष्य का जीवन धीरे-धीरे घटता जाता है। लोग अपनी दिनचर्या में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें अपने जीवन की सीमितता का एहसास नहीं होता। जन्म, वृद्धावस्था, विपत्ति, और मृत्यु का चक्र निरंतर चलता रहता है, लेकिन मनुष्य इस सत्य को नजरअंदाज कर देता है। इस पाठ में यह भी कहा गया है कि संसार की माया में लोग इस तरह से उलझे हुए हैं कि उन्हें वास्तविकता का भान नहीं होता। मोह और प्रमाद की स्थिति में वे अपने चारों ओर घटित हो रही घटनाओं को समझने में असमर्थ हैं। जीवन के अंत को भुलाकर वे भौतिक सुख-सुविधाओं की खोज में लगे रहते हैं, जो अंततः दुःख का कारण बनती हैं। अंततः, यह पाठ मानव जीवन की अनित्य और माया पर आधारित है, जिसमें व्यक्ति को अपने वास्तविक उद्देश्य की पहचान करने और सम्पूर्णता की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा दी गई है।


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