९६७ प्रेमाश्रम १९१८ | 967 Premasram 1918

By: प्रेमचंद - Premchand
९६७ प्रेमाश्रम १९१८ | 967 Premasram 1918 by


दो शब्द :

श्री प्रेमचंद का जन्म 1880 में बनारस के पास लमही में हुआ। उनका असली नाम घनपतराय था। उन्होंने आठ वर्ष की आयु में अपनी माता और चौदह में पिता को खो दिया। अपनी मेहनत से पढ़ाई की और बी.ए. की डिग्री प्राप्त की। 1901 में उन्होंने उपन्यास लिखना शुरू किया और 1907 से नियमित लेखन किया। वे उर्दू में लवावराय के नाम से लेखन करते थे, लेकिन 1910 में उनकी किताब 'सोज़े वतन' जब्त हो गई, जिसके बाद उन्होंने प्रेमचंद के नाम से लिखना शुरू किया। उन्होंने 1920 तक सरकारी नौकरी की, लेकिन सत्याग्रह से प्रेरित होकर नौकरी छोड़ दी। 1923 में उन्होंने सरस्वती प्रेस की स्थापना की और 1930 में 'हंस' पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। प्रेमचंद का निधन 8 अक्टूबर 1936 को हुआ। उनकी रचनाओं का काल 1918 से 1936 तक फैला हुआ है। 'प्रेमाश्रम' उनकी एक महत्वपूर्ण रचना है, जिसमें ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों और जमींदारों के अत्याचारों का चित्रण किया गया है। कहानी के पात्र गाँव के किसान हैं, जो जमींदारों और अधिकारियों की बेइंसाफी के बारे में चर्चा कर रहे हैं। वे अपनी समस्याओं, जैसे कि खेती में कमी, महंगाई और सरकारी दबाव के बारे में बात कर रहे हैं। पात्रों के बीच संवाद से यह स्पष्ट होता है कि गाँव के लोग अपने हाकिमों के प्रति कितने निराश और असहाय हैं, और वे अपनी स्थिति को सुधारने के लिए एकजुट होने की आवश्यकता महसूस करते हैं। कहानी में ग्रामीण जीवन की सच्चाई, सामाजिक विषमताएँ और किसानों की व्यथा को गहराई से प्रस्तुत किया गया है। प्रेमचंद ने अपने लेखन के माध्यम से भारतीय समाज के विविध पहलुओं को उजागर किया है और किसानों की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया है।


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