अद्वैत वेदांत के विभिन्न सम्प्रदायों में साक्षी का स्वरूप ओर कार्य | The nature and Function of Sakshi in the different schools of Advaita Vedanta

By: जे. एस. श्रीवास्तव - J. S. Srivastav
अद्वैत वेदांत के विभिन्न सम्प्रदायों में साक्षी का स्वरूप ओर कार्य  | The nature and Function of Sakshi in the different schools of Advaita Vedanta by


दो शब्द :

इस पाठ में अद्वित-वेदान्त के विभिन्न सम्प्रदायों में साक्षी का स्वरूप और कार्य पर चर्चा की गई है। अद्वितवाद का मुख्य विचार यह है कि आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं, और इस संसार का रूप केवल माया है। जब जीव जागता है, तब उसे अद्वित तत्व का ज्ञान प्राप्त होता है, जिसमें सृष्टि का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता। गौड़पाद के अनुसार, प्रपञ्च केवल माया है, और परमार्थ में न प्रलय है, न उत्पत्ति। माण्डक्य कारिका के अनुसार, सभी सांसारिक वस्तुएं असत्य हैं और केवल स्वप्न की भांति अनुभव की जाती हैं। आत्मा की अविद्या के कारण जीव भिन्नता का अनुभव करता है, जबकि वास्तविकता में आत्मा एक है। अद्वित तत्व परमार्थ सत् है, जो नित्य, शुद्ध और बुद्धि से परे है। आचार्य गौड़पाद ने अद्वितवाद के विरोधी मतों का खण्डन किया है, यह बताते हुए कि सृष्टि का अस्तित्व केवल भ्रम है। शंकराचार्य ने अद्वित-वेदान्त को स्थापित किया है, जिसमें आत्मा और ब्रह्म की एकता को स्पष्ट किया गया है। वेदान्त का मूल उद्देश्य उस अंतिम सत्य की खोज करना है, जो इस जगत के पीछे छिपा है। अद्वितवाद के अनुसार, यह संसार केवल माया है, और इसका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। केवल ब्रह्म ही सत्य है, और जब मनुष्य इस सत्य को जान लेता है, तब संसार की माया का लोप हो जाता है। इस ज्ञान के अभाव में मनुष्य भटकता रहता है, और जब तक इच्छाएं और तृष्णाएं हैं, तब तक सच्चे ज्ञान को प्राप्त नहीं किया जा सकता। अंततः, अद्वितवाद यह सिखाता है कि सभी भेद भ्रमित हैं और वास्तविकता में केवल एक तत्व है, जो सभी वस्तुओं के पीछे विद्यमान है। जब मनुष्य इस सत्य को जान लेता है, तब वह अद्वित तत्व के साथ स्वयं को एक कर लेता है।


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