हिन्दुत्व | Hindutva

By: वीर सावरकर - Veer Savarkar
हिन्दुत्व |  Hindutva by


दो शब्द :

यह पाठ वीर सावरकर की पुस्तक 'हिंदुत्व' की रचना के संदर्भ में है। सावरकर ने 'हिंदुत्व' लिखने का विचार तब किया जब वे इंग्लैंड में क्रांतिकारी गतिविधियों में लगे थे। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर कालेपानी की सजा दी, जिसके कारण उन्हें अंडमान की जेल में भेज दिया गया। वहां उन्होंने जेल की दीवारों पर सफेदी के साथ लिखकर 'हिंदुत्व' की रचना शुरू की, और एक छोटे पत्थर का उपयोग कर लिखा। सावरकर ने अपने साथियों के माध्यम से 'हिंदुत्व' के अध्याय जेल से बाहर भेजने की योजना बनाई। सन् 1923 में 'हिंदुत्व' पहली बार प्रकाशित हुआ, जिसमें लेखक का नाम 'एक मराठा द्वारा लिखित' के रूप में छपा। पुस्तक की सराहना देशभर में हुई, और कई प्रमुख व्यक्तियों ने इसके लेखक के रूप में सावरकर की प्रशंसा की। सावरकर ने 'हिंदुत्व' नाम के महत्व को समझाया है। उन्होंने बताया कि नाम और वस्तु के बीच गहरा संबंध होता है, और नाम का महत्व वस्तु के महत्व से कम नहीं होता। 'हिंदुत्व' नाम के साथ अनेक संस्कार और भावनाएं जुड़ी हैं, जो इसे एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक नाम बनाती हैं। पाठ में यह भी बताया गया है कि 'हिंदुत्व' और 'हिंदूवाद' के बीच भेद को समझना आवश्यक है। 'हिंदुत्व' एक व्यापक विचारधारा है, जबकि 'हिंदूवाद' केवल धार्मिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। अंत में, पाठ में प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति के संदर्भ में 'सप्त-सिंधु' का उल्लेख किया गया है, जो इस भूमि की नदियों और उनकी महत्ता को दर्शाता है। सारांश में यह कहा जा सकता है कि सावरकर ने 'हिंदुत्व' के माध्यम से अपनी संस्कृति, इतिहास और पहचान को एक नया स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया।


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