श्री पंच प्रतिक्रमण सूत्र (सचित्र) | Shri Panch Pratikraman Sutra (sachitra)

By: आनंद सागर जी - Anand Sagar Ji
श्री पंच प्रतिक्रमण सूत्र (सचित्र) | Shri Panch Pratikraman Sutra (sachitra) by


दो शब्द :

इस पाठ में आत्मा की शुद्धि और धार्मिक क्रियाओं के महत्व पर चर्चा की गई है। संसार में जीव अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न प्रकार के दुखों का अनुभव करते हैं और मानव जन्म प्राप्त करने पर आत्मा के स्वरूप का भान करने की कोशिश करते हैं। आत्मा की शुद्धि के लिए श्रावश्यक क्रियाओं का पालन आवश्यक है, जिसमें नियमित धार्मिक क्रियाएं शामिल होती हैं। सभी धर्मों में कुछ क्रियाएं अनिवार्य मानी जाती हैं, जैसे कि जैन धर्म में प्रतिक्रमण। साधुओं के लिए प्रतिक्रमण अनिवार्य है, जबकि श्रावक समाज में यह वैकल्पिक होता है। हालांकि, अधिकांश श्रावक इसे यथासंभव करने का प्रयास करते हैं। श्रावश्यक क्रियाएं आत्मा के गुणों को व्यक्त करने में सहायक होती हैं और इन्हें छह विभागों में विभाजित किया जा सकता है: सामायिक, चतुविशतिस्तव, गुरुवंदन, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग, और प्रत्यास्यान। इन क्रियाओं के माध्यम से आत्मा की शुद्धि और विकास के लिए आवश्यक प्रयास किए जाते हैं। इस प्रकार, पाठ आत्मा के कल्याण और धर्म के प्रति जागरूकता की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।


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