तंत्र महाविज्ञान पार्ट -1 | Tantra Mahavigyan – 1

By: श्रीराम शर्मा आचार्य - Shri Ram Sharma Acharya


दो शब्द :

इस पाठ का सारांश यह है कि भारतीय तंत्र विद्या का महत्व और उसकी गूढ़ता पर चर्चा की गई है। तंत्र ग्रंथों को भगवान शिव के मुख से प्रकट माना जाता है, लेकिन कुछ विद्वान इन्हें दूषित प्रवृत्तियों का स्रोत मानते हैं। दोनों दृष्टिकोणों का निष्पक्षता से विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि तंत्र विद्या का वास्तविक स्वरूप अध्यात्म विज्ञान पर आधारित है, न कि अंधविश्वास पर। प्रारंभ में, भारतीय मनीषियों ने मोक्ष के लिए कठिन तप और गृह त्याग का प्रवर्तन किया, जिससे सामान्य जनों में दूरी बढ़ी। तंत्र विद्या का उदय इस उद्देश्य से हुआ कि लोग गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी आध्यात्मिक प्रगति कर सकें। हालांकि, समय के साथ कुछ लोगों ने तंत्र को जादू-टोने से जोड़ा और इसे बदनाम कर दिया। पाठ में तंत्र की प्राचीनता, इसके विभिन्न प्रकार, और तंत्र साधना में गुरु की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला गया है। इसके अलावा, तंत्र विद्या को फिर से समझने और इसके वास्तविक उद्देश्य को पहचानने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। कुल मिलाकर, यह पाठ तंत्र विद्या को एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता को दर्शाता है, ताकि इसके वास्तविक लाभों को समझा जा सके और इसे गलतफहमियों से मुक्त किया जा सके।


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