स्त्री रोग चिकित्सा दर्शन भाग-१ | Stri Rog Chikitsa Darshan Part-1

- श्रेणी: Ayurveda | आयुर्वेद Homoeopathic and Medical Sciences | होमियोपैथिक और चिकित्सा महिला / Women रोग / disease
- लेखक: नारायणदास - Narayandas
- पृष्ठ : 130
- साइज: 7 MB
- वर्ष: 1898
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दो शब्द :
इस पाठ में मानव शरीर के विकास और स्वास्थ्य के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। यह मानव जीवन के विभिन्न चरणों जैसे युवा अवस्था, बुढ़ापे की प्रारंभिक और द्वितीय अवस्थाओं का विवरण करता है। युवा अवस्था (24 से 43 वर्ष) में शरीर का विकास और मानसिक क्रियाओं में वृद्धि होती है, लेकिन धीरे-धीरे बीमारियों का सामना भी करना पड़ता है। बुढ़ापे की पहली अवस्था (44 से 54 वर्ष) में शारीरिक और मानसिक शक्ति में कमी आने लगती है, जिससे कई स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न होती हैं। दूसरी अवस्था (54 वर्ष से आगे) में शरीर की बनावट में बदलाव आता है, जिससे इंद्रियों की क्षमता और गति में कमी आती है। पाठ में यह भी बताया गया है कि स्त्रियों की शारीरिक संरचना और बीमारियों की प्रकृति पुरुषों से भिन्न होती है। इसके अलावा, तंदुरुस्ती के लिए मौसम, भोजन, जल, वायु, और व्यावसायिक आदतों का महत्व बताया गया है। स्वास्थ्य पर प्रभाव डालने वाले कारकों में दूषित वायु और खराब पानी की गुणवत्ता का उल्लेख किया गया है। दूषित वातावरण से विभिन्न रोग उत्पन्न होते हैं, जैसे कि बुखार और श्वसन संबंधी समस्याएं। अंत में, यह पाठ यह सिखाता है कि स्वस्थ जीवनशैली के लिए सही खानपान, ताजगी भरी हवा, और स्वच्छ जल का होना अत्यंत आवश्यक है। इसके अलावा, भोग-विलास और अव्यवस्थित जीवनशैली भी स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
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