दो शब्द :

इस पाठ में मनोविज्ञान और विशेष रूप से शिक्षा-मनोरविज्ञान के विकास और महत्व पर चर्चा की गई है। लेखक ने मनोविज्ञान की परिभाषा में समय के साथ हुए परिवर्तनों का उल्लेख किया है। प्राचीन काल में इसे आत्मा की क्रियाओं के अध्ययन के रूप में देखा जाता था, लेकिन आधुनिक काल में इसका दायरा बढ़ा है और इसे मन की क्रियाओं का अध्ययन माना जाता है। शिक्षा-मनोरविज्ञान, सामान्य मनोविज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो बच्चों की मनोवृत्तियों और उनकी सीखने की प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करता है। शिक्षा का उद्देश्य बच्चों के मानसिक विकास को प्रोत्साहित करना है, और इसका आधार मनोविज्ञान के सिद्धांतों पर निर्भर करता है। लेखक ने यह भी बताया कि समाज के बदलते दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा की प्रणाली में बदलाव होते रहते हैं, जिससे शिक्षकों और अभिभावकों में निरंतरता की कमी का अनुभव होता है। इसलिए, नई शोध और सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए नई पुस्तकें लिखना आवश्यक है। इस पुस्तक की लेखिका श्रीमती चंद्रावती लखनपाल ने शिक्षा-मनोरविज्ञान के आधुनिक सिद्धांतों को हिंदी में प्रस्तुत किया है, जिससे हिंदी भाषी अध्यापक और छात्र लाभ उठा सकें। पुस्तक में विषय की गहराई के साथ-साथ भारतीय संदर्भ को ध्यान में रखकर उदाहरण दिए गए हैं, जो इसे और भी उपयोगी बनाते हैं। इस प्रकार, यह पाठ शिक्षा-मनोरविज्ञान की महत्ता, उसके विकास, और इसे समझने के लिए आवश्यक संसाधनों का संक्षिप्त सारांश प्रस्तुत करता है।


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