कहत कबीर | Kahat Kabir

- श्रेणी: काव्य / Poetry दार्शनिक, तत्त्वज्ञान और नीति | Philosophy भक्ति/ bhakti
- लेखक: हरिशंकर परसाई - Harishankar Parsai
- पृष्ठ : 210
- साइज: 3 MB
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दो शब्द :
इस पाठ में कवि ने राजनीति और समाज की स्थिति पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की है। लेखक हरिशंकर परसाई ने 'सुनो भई साधो' नामक स्तंभ के माध्यम से समय-समय पर विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय प्रस्तुत की है। उन्होंने बताया है कि वे लंबे समय से नियमित लेखन कर रहे हैं और पाठकों ने उनके लेखों को पसंद किया है। लेख में भारतीय राजनीति के संदर्भ में कई घटनाओं और नेताओं के बारे में चर्चा की गई है। खासकर भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) की राजनीति और रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। लेखक ने इसे हिटलर के नाजियों की नीतियों से जोड़ा है, यह बताते हुए कि पार्टी सच बोलने से कतराती है और राजनीतिक चालाकियों का सहारा लेती है। कवि ने यह भी बताया है कि किस तरह से राजनीतिक नेता अपनी स्वार्थी नीतियों के लिए जनता को भ्रमित करते हैं। उन्होंने बताया कि चुनाव के दौरान नेता कैसे जनता के बीच में जाकर उनके दुख-दर्द का नाटक करते हैं, जबकि असल में उनका मकसद केवल सत्ता में आना होता है। पाठ में राजनेताओं की चालाकियों, उनकी बयानबाजी और चुनावी रणनीतियों का मजाक उड़ाया गया है। यह स्पष्ट किया गया है कि राजनीति में केवल दिखावे और झूठे वादों का महत्व होता है। कुल मिलाकर, यह पाठ भारतीय राजनीति की विडंबनाओं और नेताओं की स्वार्थी प्रवृत्तियों पर एक तीखा व्यंग्य है, जिसमें लेखक ने समाज के प्रति अपनी जागरूकता और चिंता व्यक्त की है।
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