रत्नाकर | Ratnakar

- श्रेणी: काव्य / Poetry भक्ति/ bhakti हिंदी / Hindi
- लेखक: श्री जगन्नाथदास - shree Jagannathdas
- पृष्ठ : 604
- साइज: 59 MB
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दो शब्द :
इस पाठ में राकर भरा शीर्षक के अंतर्गत गोलोकवासी श्री जगन्नाथदास रल्लाकर के काव्यों का संग्रह प्रस्तुत किया गया है। इसमें रत्नाकर जी की काव्य-रचनाओं और उनकी काव्यात्मकता पर प्रकाश डाला गया है। रत्नाकर जी को व्रज-भाषा के श्रेष्ठ कवियों में से एक माना गया है और उनके काव्य का मुख्य उद्देश्य भक्तिपूर्ण भावनाओं का संचार करना था। रत्नाकर जी की रचनाओं में "हिंडोला" नामक प्रबंध-काव्य सबसे पुराना है, जिसे उन्होंने संशोधित किया। इसके अलावा, "समालोचनादश" और "हरिश्चंद्र" जैसी अन्य रचनाएँ भी हैं। रत्नाकर जी ने "गंगावतरण" नामक प्रसिद्ध काव्य की रचना की, जिसने उन्हें पुरस्कार भी दिलाया। उनके रचनात्मक कार्य में "उद्धव-शतक" और "कल्न-काशी" जैसी कृतियाँ भी शामिल हैं, हालांकि कुछ अधूरी रह गईं। इस संग्रह में रत्नाकर जी के फुटकर छंदों का भी समावेश किया गया है, जिनका संग्रह उनके निधन के बाद किया गया। प्रकाशक ने पाठकों से आग्रह किया है कि यदि किसी के पास ऐसी रचनाएँ हों जो इस संग्रह में शामिल नहीं की गई हैं, तो वे उन्हें भेजें ताकि भविष्य के संस्करण में उन्हें शामिल किया जा सके। इसके अतिरिक्त, रत्नाकर जी की अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ जैसे "बिहारी-रत्नाकर" और "सुख्हुकधा" का भी उल्लेख किया गया है, जो अभी प्रकाशन के इंतजार में हैं। इस संग्रह को उनके पहले वार्षिक श्राद्ध के अवसर पर श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे हिंदी प्रेमियों को रत्नाकर जी की काव्य प्रतिभा का अनुभव हो सके। अंत में, रत्नाकर जी की कृतियों के माध्यम से व्रजभाषा की महत्ता और उसकी स्थायी सुंदरता को उजागर किया गया है, साथ ही यह भी बताया गया है कि भाषा का विकास और परिवर्तन समय के साथ होता है।
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