दो शब्द :

इस पाठ में हिंदी काव्य प्रवाह के इतिहास, विशेषकर सिद्ध सरहपा और उनके समकालीनों की रचनाओं पर चर्चा की गई है। आचार रामचंद्र शुक्ल ने सिद्धों को हिंदी साहित्य के प्रारंभिक चरण का महत्वपूर्ण हिस्सा माना है, और महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भी सिद्ध सरहपा को शीर्ष स्थान दिया है। सिद्धों की रचनाएँ तांत्रिक और योगमार्गी विषयों पर आधारित हैं, जिनका जीवन की स्वाभाविक अनुभूतियों से कोई संबंध नहीं है, इसलिए उन्हें शुद्ध साहित्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। आचार्य शुक्ल के अनुसार, हिंदी साहित्य का काल विभाजन आदिकाल, पूर्व मध्यकाल, उत्तर मध्यकाल और आधुनिक काल में किया गया है। हालांकि, उन्होंने सिद्धों और योगियों की रचनाओं को शुद्ध साहित्य नहीं माना, फिर भी उन्होंने भवित-साहित्य का अध्ययन इसी आधार पर किया। पिछले कुछ दशकों में हिंदी साहित्य के विभिन्न पहलुओं का गहन अध्ययन हुआ है, जिससे शुक्ल की कई स्थापनाओं को चुनौती दी गई है। लेख में यह भी बताया गया है कि सिद्धों, नाथों, संतों, सूफियों और भक्तों की रचनाएं धार्मिक आस्थाओं से प्रभावित हैं, और उनका साहित्य केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्की मानव अनुभवों के व्यापक संदर्भ में भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए। तुलसीदास जैसे कवियों का काम धार्मिक प्रेरणा से उत्पन्न हुआ, लेकिन उनका साहित्य अब सर्वजन के लिए स्वीकार्य है। आखिर में, यह सुझाव दिया गया है कि हिंदी साहित्य का मूल्यांकन करते समय धार्मिक और साहित्यिक तत्वों का समन्वय आवश्यक है, ताकि साहित्य का सम्पूर्ण और सही मूल्यांकन किया जा सके।


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