दो शब्द :

यह पाठ डॉ. बड़थ्वाल के संत संबंधी निबंधों के संग्रह की प्रस्तावना है। इसमें प्रकाशक विश्वनाथ शर्मा ने बताया है कि वे डॉ. बड़थ्वाल के विचारों को काशी विद्यापीठ के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं। निबंधों में प्रेम और भक्ति की प्रधानता है, और संतों की वाणी, जीवन गाथा और दर्शन की व्याख्या की गई है। डॉ. बड़थ्वाल ने संतों के संदेश को एक सच्चे विश्व धर्म के रूप में प्रस्तुत किया है, जो हर काल और परिस्थिति के लिए उपयुक्त है। लेखक ने संतों की विचारधारा को महत्वपूर्ण बताया है और महात्मा गांधी को संत विचारों के सबसे बड़े प्रचारक के रूप में उल्लेख किया है। पाठकों से अपेक्षा की गई है कि वे इन निबंधों में प्रेम के साम्राज्य की खोज करेंगे। इसके आगे, लेख में सिद्धों की परंपरा और उनके योगदान का उल्लेख किया गया है। यह बताया गया है कि संतों ने योग को आध्यात्मिकता का माध्यम माना और इसके माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति की। योग की परंपरा का विकास कबीर और उनके समकालीन संतों के समय से हुआ है। अंत में, लेख में स्वामी राघवानंद का उल्लेख है, जो रामानंद के गुरु रहे हैं और योग विद्या में पारंगत थे। उनके जीवन को और उनके योगदान को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। इस प्रकार, लेख संतों, योग, और डॉ. बड़थ्वाल के विचारों का सार प्रस्तुत करता है, जो हिंदी साहित्य और आध्यात्मिकता के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।


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