दो शब्द :

इस पाठ में 'न्याय-दर्शन' के सिद्धांतों और उनकी व्याख्या का विवरण दिया गया है। पाठ की शुरुआत में यह बताया गया है कि सभी प्राणी सुख की खोज में लगे रहते हैं, लेकिन अधिकांश लोग अपने जीवन में दुःख और अभाव का सामना करते हैं। यहां तक कि जिनके पास भौतिक सुख-साधन हैं, वे भी असंतुष्ट रहते हैं। इसके पीछे के कारणों की तलाश में भारतीय तत्वदर्शियों ने यह समझाया है कि मनुष्य का जन्म इस संसार के अभावों से मुक्ति पाने के लिए हुआ है। सुख की खोज करना मूर्खता है, जबकि वास्तविकता यह है कि दुःखों और अभावों का सामना करना ही जीवन का उद्देश्य है। पाठ में न्याय-दर्शन का महत्व स्पष्ट किया गया है। न्याय-दर्शन के अनुसार, मनुष्य को अपने विचारों और ज्ञान को शुद्ध करना चाहिए ताकि वह सत्य और असत्य के बीच भेद कर सके। इसके लिए पहले विभिन्न प्रमाणों का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। न्याय-दर्शन 16 सिद्धांतों का उल्लेख करता है, जिनमें प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, उदाहरण, सिद्धांत, अवयव, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, कटुता, और निग्रह स्थान शामिल हैं। प्रमाणों के प्रकारों का भी उल्लेख किया गया है: प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, और उपमान। प्रत्यक्ष प्रमाण वह है जो इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त होता है, जब कि अनुमान उन चीजों के लिए उपयोगी है जो अप्रत्यक्ष हैं। न्याय-दर्शन में यह भी बताया गया है कि किसी विषय का सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए विभिन्न विद्वानों के बीच चर्चा और प्रमाणों का उपयोग करना आवश्यक है। इस प्रकार, न्याय-दर्शन का मुख्य उद्देश्य सत्य का ज्ञान प्राप्त करना और उसके आधार पर सही निर्णय लेना है, ताकि मनुष्य अपने जीवन में सही दिशा में कदम रख सके और सुख की वास्तविकता को समझ सके।


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