एक और ज़िन्दगी | Ek aur Zindagi

By: मोहन राकेश - Mohan Rakesh
एक और ज़िन्दगी | Ek aur Zindagi by


दो शब्द :

इस पाठ में एक व्यक्ति, प्रकाश, की मनोदशा और उसकी भावनाओं का वर्णन किया गया है। वह एक कमरे में अकेला बैठा है और उसके मन में असमंजस और बेचैनी है। उसे लगता है कि उसका बच्चा और उसकी पत्नी बीना वहां से जा रहे हैं, लेकिन वह चाहता है कि वे रुक जाएं। प्रकाश कमरे के बिखरे सामान को देखता है और बिस्तर पर कम सलवटें देखकर उसे गहरी नींद का अहसास होता है, जो उसे अपने हालात से भागने का एक तरीका लगता है। वह बार-बार बालकनी में जाकर देखता है कि क्या वे लोग लौटेंगे या नहीं। दिन बीतता है, और उसकी चिंता बढ़ती जाती है। जब अंततः प्रकाश बाहर जाता है, तो उसे बीना और बच्चे को देखता है, लेकिन बच्चा उससे नाराज है और बीना उसे समझाने में कठिनाई महसूस कर रही है। बच्चा अपने पिता के साथ नहीं जाना चाहता, और यह स्थिति प्रकाश को और अधिक दुखी कर देती है। जब बीना बच्चे को लेकर वापस जाती है, तो प्रकाश उनसे अलगाव का अनुभव करता है और उनके जाने से पहले बीना से बातचीत करता है। बातचीत में बीना प्रकाश से पैसे के बारे में पूछती है, जो उसने बच्चे के लिए रखे थे, और वे दोनों एक दूसरे के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं। अंत में, जब बच्चा बीना का हाथ पकड़कर नीचे जाने लगता है, तो प्रकाश का दिल टूट जाता है, और वह अपने अकेलेपन और खोने के अहसास में डूब जाता है। पाठ का अंत प्रकाश के एक क्लब में शराब पीने के साथ होता है, जहां वह अपने दुख को भुलाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन उसकी मनोदशा और विचार लगातार उसे परेशान करते रहते हैं। उसकी स्थिति यह दर्शाती है कि वह अपने परिवार के प्रति कितने संवेदनशील और भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, और उसकी खोने की भावना उसे और भी अधिक दुखी करती है।


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