दो शब्द :

इस पाठ में मन की प्रकृति, उसकी वृत्तियों, और मन पर विजय प्राप्त करने के साधनों पर चर्चा की गई है। मन को मानव जीवन में महत्वपूर्ण माना गया है, और यह बताया गया है कि आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए मन का नियंत्रण आवश्यक है। मन की गतिविधियाँ शुभ और अशुभ विचारों से प्रभावित होती हैं, और यह मन का अशुभ चित्तन ही व्यक्ति को दुःख में डालता है। स्वामी श्री अच्युतानन्दजी ने मन की प्रकृति को समझाने के लिए कई दृष्टांत प्रस्तुत किए हैं। मन को एक चोर के समान बताया गया है, जो व्यक्ति की आत्मा को कष्ट पहुँचाता है। मन और इन्द्रियों का संयोजन मिलकर व्यक्ति को बंधित करता है। मन की वृत्तियों का निरोध या नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इससे ही आत्मा का उद्धार संभव है। पाठ में यह भी उल्लेख किया गया है कि मन की प्रकृति अत्यंत सूक्ष्म है, और इसे नियंत्रित करने के लिए विशेष साधन और युक्तियों की आवश्यकता होती है। मन का स्वरूप संकल्प और विकल्प के माध्यम से समझाया गया है। मन को वश में लाने के लिए वैराग्य और अभ्यास की आवश्यकता है। अंततः, यह पाठ हमें इस बात की प्रेरणा देता है कि हमें अपने मन को समझकर और उसके नियंत्रण के उपायों को अपनाकर आत्मज्ञान की दिशा में अग्रसर होना चाहिए।


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