चुल्लू भर पानी | Chullu Bhar Pani

By: डॉ. सत्यप्रकाश - Dr Satyaprakash
चुल्लू भर पानी | Chullu Bhar Pani by


दो शब्द :

इस पाठ में "चुल्लू भर पानी" नामक व्यंग्य कथा का समावेश है, जिसमें एक नेता अपने आत्मसमर्पण की घोषणा करते हुए जनता के सामने अपने विचार साझा करता है। नेता जी का मानना है कि उन्होंने हमेशा जनता के हित में काम किया है, लेकिन उनकी आकांक्षाएं भी महत्वपूर्ण हैं। वह यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने चुनावी वादे पूरे नहीं किए और यह भी कि उन्होंने विदेशी कमीशन खाया है, लेकिन इसके लिए वह खुद को सही ठहराते हैं। नेता जी जनता को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि उनके लिए व्यक्तिगत और पारिवारिक लाभ पहले आता है और विकास की प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है। वह यह कहते हैं कि अगर डूबने का निर्णय लिया है, तो यह उनके लिए उचित है क्योंकि वह जनता के न्यायालय में निरंतर जवाबदेह हैं। उनकी इस आत्मस्वीकृति और तर्कों के कारण जनता उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त करती है। कथा में व्यंग्य और हास्य का तत्व प्रमुख है, जो समाज के राजनीतिक तंत्र और नेताओं की मानसिकता की आलोचना करता है। अंततः, पाठक यह सोचने पर मजबूर होता है कि क्या नेताओं की बातें जनहित में होती हैं या मात्र व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए।


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