नवरात्री पूजा विधान | Navratri Pooja vidhan

- श्रेणी: ग्रन्थ / granth जैन धर्म/ Jainism पूजा पाठ और काण्ड / pooja path and kand साधना /sadhana
- लेखक: शैलेश जैन - Shailesh Jain
- पृष्ठ : 185
- साइज: 5 MB
- वर्ष: 1937
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दो शब्द :
इस पाठ में जीवन की कठिनाइयों और दुखों के बारे में चर्चा की गई है। वर्तमान समय में अधिकांश लोग दुखी हैं और सुख की तलाश में हैं, लेकिन वे धर्म का पालन नहीं कर रहे हैं। पाठ में बताया गया है कि धर्म ही सुख का स्रोत है और सुख प्राप्त करने के लिए धर्म का पालन करना आवश्यक है। समाज में अशांति और समस्याओं की भरमार है, जिसके चलते लोग भूत-प्रेत, जादू-टोना आदि के शिकार बनते हैं और अपने दुखों से मुक्ति के लिए गलत रास्तों पर जाते हैं। इस संदर्भ में जैन धर्म के सिद्धांतों का पालन करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। विशेष रूप से, पद्मावती माता के शुकवार व्रत का उल्लेख किया गया है, जिसे नवरात्रि में विशेष महत्व दिया गया है। पाठ में इस व्रत का विधान और विधियों का विवरण दिया गया है, जिससे भक्त अपनी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। इसके अलावा, जीवन की यात्रा और मृत्यु के बाद की पुनर्जन्म की प्रक्रिया के बारे में भी चर्चा की गई है। यह बताया गया है कि धर्म मोक्ष का साधन है और परोपकार, सत्य, अहिंसा जैसे गुणों का पालन करके ही व्यक्ति मोक्ष की ओर बढ़ सकता है। पाठ में व्यक्त किया गया है कि भक्ति और पूजा के माध्यम से व्यक्ति अपने चित्त को निर्मल कर सकता है, जिससे जीवन में सुख और शांति की प्राप्ति हो सकती है। अंत में, ग्रंथ के प्रकाशन में सहयोग देने वाले लोगों का आभार व्यक्त किया गया है और पाठ का उद्देश्य समाज के कल्याण की कामना करना बताया गया है।
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