चिकित्सा - चंद्रोदय (भाग ५) | Chikitsa - Chandrodya (part5)

By: बाबू हरिदास वैध - Babu Haridas Vaidhya


दो शब्द :

इस पाठ में आयुर्वेद और चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है, विशेष रूप से विष-चिकित्सा के बारे में। लेखक ने पाठकों से विनम्रता से अनुरोध किया है कि वे धैर्य रखें और जल्दी-जल्दी न करें क्योंकि आयुर्वेद एक कठिन विषय है और इसके विषय में सही जानकारी देना महत्वपूर्ण है। लेखक ने विभिन्न रोगों के निदान, उनके लक्षण और उपचार के बारे में जानकारी दी है। उन्होंने रक्तपित्त, खांसी, श्वास, उदर रोग आदि के उपचार के लिए छठे भाग में अधिक जानकारी देने का वादा किया है। इसके साथ ही, उन्होंने बताया कि विष के विभिन्न प्रकार होते हैं, जैसे वातिक, पैत्तिक और श्लेष्मिक, और प्रत्येक प्रकार की विष की चिकित्सा अलग-अलग होती है। विष के लक्षणों का वर्णन करते हुए लेखक ने बताया है कि काटने वाले सर्प के प्रकार और उनके दांतों की स्थिति से विष की तीव्रता का आकलन किया जा सकता है। इसके अलावा, उन्होंने विष के प्रभाव को कम करने के लिए विभिन्न औषधियों और उपचार विधियों का सुझाव दिया है, जैसे कि घी, शहद, और विभिन्न जड़ी-बूटियों का उपयोग। इस पाठ का मुख्य उद्देश्य पाठकों को आयुर्वेदिक चिकित्सा की जटिलताओं और विष-चिकित्सा के महत्व के बारे में जागरूक करना है। लेखक ने इस बात पर जोर दिया है कि चिकित्सा का कार्य गंभीरता से लेना चाहिए और डॉक्टरों से सलाह लेकर ही उपचार करना चाहिए।


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