दो शब्द :

इस पाठ में ध्यान और साधना के माध्यम से ब्रह्म का अनुभव करने की प्रक्रिया पर चर्चा की गई है। साधक को किसी एक मंत्र या महावाक्य का ध्यान करना चाहिए, जिससे वह ब्रह्म के स्वरूप में स्थित हो सके। मन और अंतःकरण को शुद्ध और सात्विक बनाना आवश्यक है ताकि ब्रह्माकार वृत्ति का विकास हो सके। मन की प्रकृति और उसकी वृत्तियों का वर्णन किया गया है। यह बताया गया है कि मन की शक्ति के माध्यम से साधक अपने भीतर की अज्ञानता और भ्रम को दूर कर सकता है। अज्ञानता के अंधकार से निकलकर साधक को आत्मा के सच्चे स्वरूप की पहचान करनी होती है। साधना के चार साधन हैं: विवेक, वैराग्य, शम और दम, जिनके आधार पर साधक को आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिए। इसके बाद, गुरु की शरण में जाकर उचित उपदेश ग्रहण करना आवश्यक है। गुरु साधक को अद्वितीयता के महावाक्यों का ज्ञान देते हैं, जैसे 'तत्त्वमसि' और 'अहं ब्रह्मास्मि', जो साधक की विचारधारा को बदलने में सहायक होते हैं। साधक को निरंतर 'अहं ब्रह्मास्मि' का चिंतन करना चाहिए और एकान्त में रहकर ध्यान साधना करना चाहिए। इस प्रक्रिया में साधक के मन की वृत्तियाँ विषयों से विमुख होकर ब्रह्म की ओर अग्रसर होती हैं। इस प्रकार, साधना के माध्यम से साधक अपने भीतर की ब्रह्माकार वृत्ति को विकसित करता है, जिससे वह आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानता है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति करता है। अंत में, यह कहा गया है कि ब्रह्म का अनुभव एक गहन और कठिन प्रक्रिया है, जिसमें साधक को निरंतर साधना और ध्यान के माध्यम से अपने मन और वृत्तियों को नियंत्रित करना होता है। इस प्रकार, साधक को अपने अंतःकरण में ब्रह्म को पहचानने के लिए पूरी मेहनत और समर्पण से प्रशिक्षण करना चाहिए।


Please share your views, complaints, requests, or suggestions in the comment box below.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *