श्री कल्पसूत्र | Shree kalpsutra

By: माणकमुनिजी - Manakmuniji
श्री कल्पसूत्र  | Shree kalpsutra by


दो शब्द :

इस पाठ में जैन धर्म के ग्रंथ "कल्प सूत्र" का वर्णन किया गया है, जिसमें 24 तीर्थकरों और उनके जीवन, उपदेशों तथा उनके अनुयायियों की शिक्षाओं का विस्तार से उल्लेख किया गया है। यह ग्रंथ भद्रबाहु द्वारा रचित है और इसका महत्व जैन परंपरा में अत्यधिक है। पाठ का आरंभ तीर्थकर महावीर के चरित्र से होता है, जिसमें उनके जीवन, उपदेश और उनके निर्वाण का उल्लेख किया गया है। महावीर को अंतिम तीर्थकर माना जाता है और उनके उपदेश आज भी जैन समाज में प्रासंगिक हैं। इसके बाद, पाठ में भद्रबाहु के समय और उनके योगदान का वर्णन है, जिसमें यह बताया गया है कि उन्होंने जैन धर्म के सिद्धांतों को संरक्षित करने और फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भद्रबाहु ने साधुओं के आचार-विचार और उनके जीवनशैली पर भी प्रकाश डाला है। इस ग्रंथ में ज्ञान की गहराई, साधु जीवन की सरलता और जैन धर्म के मूल तत्वों का वर्णन किया गया है, जिसमें आत्मा, कर्म, और मोक्ष की अवधारणाओं पर जोर दिया गया है। पाठ में सामाजिक और धार्मिक समरसता का भी उल्लेख है, जिसमें साधु और गृहस्थ के बीच की संबंधों का महत्व बताया गया है। अंत में, पाठ में पाठक को जैन धर्म के मूलभूत सिद्धांतों को समझने और अपनाने के लिए प्रेरित किया गया है, जिससे वे अपने जीवन में संतुलन और शांति प्राप्त कर सकें।


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