विवाह की मुसीबतें | Vivah Ki Musibatein

- श्रेणी: इतिहास / History ग्रन्थ / granth निबंध / Essay
- लेखक: रामधारी सिंह 'दिनकर' - Ramdhari Singh Dinkar
- पृष्ठ : 102
- साइज: 2 MB
- वर्ष: 1974
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दो शब्द :
इस पाठ में रामधारी सिंह दिनकर ने विवाह की जटिलताओं और उससे जुड़ी समस्याओं पर विचार किया है। उन्होंने एक व्यक्ति की कहानी से शुरुआत की, जिसने एक लड़की से प्रेम किया लेकिन उम्र के भेद के कारण उससे विवाह नहीं किया। जब वह लड़की विवाह करती है, तो उसका सुखी जीवन एक प्रश्न बन जाता है, जिससे दिनकर यह सवाल उठाते हैं कि क्या विवाह के बाद की सुख-समृद्धि वास्तव में जीवित होती है या यह एक मुरदा स्थिति है। दिनकर ने यह बताया है कि समाज में कई विवाहित महिलाएं दुखी और लाचार हैं, जबकि कुछ ऐसी भी हैं जो अपने दाम्पत्य जीवन को चुपचाप सहन कर रही हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि जिन पत्नियों का दाम्पत्य जीवन संतोषजनक होता है, वे समझदारी से एक-दूसरे को स्वतंत्रता देती हैं। विवाह में सुख और अशांति का संबंध काम से है, लेकिन यह भी सच है कि शिक्षित और धनाढ्य वर्ग में विवाह की समस्याएं अधिक होती हैं। विवाह का स्वरूप और उसके पीछे की परंपराएं भी इसके मुद्दों को जटिल बनाती हैं। दिनकर ने यह स्पष्ट किया कि प्रेम विवाह की संभावना को बढ़ावा देता है, लेकिन विवाह के बाद प्यार की कमी और संवाद की कमी हो जाती है। पुरुष अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं, जबकि महिलाएं समय बिताने के तरीकों की तलाश करती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि महिलाओं की कुछ मानसिकताएं और स्वभाव, जैसे त्याग और अहंकार, विवाह की समस्याओं को बढ़ाते हैं। उन्होंने विवाह-विच्छेद के अधिकार और महिलाओं के नियंत्रण को भी रेखांकित किया, यह बताते हुए कि समाज की पारंपरिक धारणाएं महिलाओं के स्वभाव को प्रभावित करती हैं। अंत में, दिनकर ने यह कहा कि विवाह की समस्याएं केवल व्यक्तिगत नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों से भी जुड़ी हैं। इस प्रकार, पाठ विवाह के विभिन्न पहलुओं और उनकी जटिलताओं पर गहन विचार प्रस्तुत करता है।
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