वीर सतसई | Veer Satsai

- श्रेणी: ग्रन्थ / granth साहित्य / Literature
- लेखक: नरोत्तमदास - Narottam Das
- पृष्ठ : 306
- साइज: 28 MB
- वर्ष: 1988
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दो शब्द :
"वीर सतसई" महाकवि सूर्यमलल मिश्रण की काव्य रचना है, जो राजस्थानी वीर काव्य का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह ग्रंथ दो भागों में विभाजित है; पहले भाग में प्रस्तावना है जिसमें राजस्थानी वीर काव्य की विशेषताओं, पृष्ठभूमि और इसके प्रमुख कवियों पर चर्चा की गई है, जबकि दूसरे भाग में "वीर सतसई" का मूल पाठ, शब्दार्थ और भावार्थ सहित प्रस्तुत किया गया है। राजस्थानी साहित्य की विशेषता यह है कि यह जीवन के संघर्ष, बलिदान और वीरता को उजागर करता है। राजस्थान की भौगोलिक स्थिति ने यहाँ के लोगों में साहस और त्याग की भावना विकसित की है। इस साहित्य में नारी को प्रेरणा स्रोत के रूप में चित्रित किया गया है, जो वीरों को युद्ध के लिए प्रेरित करती है और स्वयं भी कठिनाइयों का सामना करती है। "वीर सतसई" में युद्ध, वीरता और बलिदान का भावमय चित्रण है। इसमें नायक-नायिकाओं की गाथाएँ, युद्ध के दृश्य और समाज की सांस्कृतिक धारा को दर्शाया गया है। इस काव्य में मृत्यु को एक शुभ अवसर के रूप में स्वीकार किया गया है, जो जीवन के संघर्ष का एक अभिन्न हिस्सा है। ग्रंथ का संपादन ज्ञानवर्धक टिप्पणियों और संदर्भों के साथ किया गया है, जिससे पाठक को राजस्थानी वीर काव्य की गहरी समझ प्राप्त होती है। यह काव्य केवल वीरता का गुणगान नहीं करता, बल्कि प्रेम, त्याग और बलिदान की भी महत्ता को दर्शाता है। "वीर सतसई" विद्वानों और छात्रों दोनों के लिए राजस्थानी साहित्य के अध्ययन में सहायक है।
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