मानसिक ब्रह्मचर्य अथवा कर्मयोग | Mansik Brahmcharya Athva karmyog

By: फकीरचन्द कानोडिया - Fakirchand Kanodia


दो शब्द :

इस पाठ का सारांश इस प्रकार है: लेखक फकीरचन्द कानोड़िया ने "मानसिक ब्रह्मचर्य अथवा कर्मयोग" पुस्तक के माध्यम से यह विचार प्रस्तुत किया है कि साहित्य का निर्माण जीवन से उत्पन्न होना चाहिए। साहित्य को केवल मनोरंजन या आर्थिक लाभ के लिए नहीं लिखा जाना चाहिए, बल्कि यह जीवन की वास्तविकता और अनुभवों से जुड़ा होना चाहिए। लेखक का मानना है कि अगर साहित्य जीवन के साथ नहीं चलता है, तो वह प्रगति में बाधा डाल सकता है। उन्होंने यह भी बताया है कि ग्राहकों को यह समझना चाहिए कि वे किसी भी वस्तु को खरीदते समय उसके मूल्य और लाभ का मूल्यांकन करें। यदि कोई किताब उनके लिए लाभकारी है, तो उन्हें बिना हिचकिचाहट के उसे खरीदना चाहिए। लेखक ने यह भी सुझाव दिया है कि जो लोग आर्थिक कारणों से किताब नहीं खरीद सकते, वे पुस्तकालय से या मित्रों के माध्यम से किताबें प्राप्त करने की कोशिश कर सकते हैं। इस प्रकार, लेखक ने जीवन से जुड़े साहित्य के महत्व और उसे अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। वे यह भी कहते हैं कि साहित्यकारों को जीवन की प्रगति के लिए अपने लेखन के माध्यम से योगदान देना चाहिए, और यदि इससे उन्हें आर्थिक लाभ होता है, तो यह उनके लिए एक सकारात्मक बात है। कुल मिलाकर, यह लेख साहित्य, जीवन, और पुस्तक खरीदने की प्रक्रिया के बीच के संबंध को समझाने का प्रयास करता है।


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