रजनीश ध्यान योग (१९७७) एक ५२३७ | Rajnish Dhyan Yog (1977) Ac 5237

By: आचार्य श्री रजनीश (ओशो) - Acharya Shri Rajneesh (OSHO)


दो शब्द :

इस पाठ में भगवान श्री रजनीश द्वारा ध्यान योग की विभिन्न विधियों और सिद्धांतों का वर्णन किया गया है। ध्यान को एक वैज्ञानिक दृष्टि से समझाया गया है, जिसमें इसे आत्म-चिंतन और जीवन का अमृत कहा गया है। ध्यान का अभाव मन को विकृत करता है, जबकि ध्यान करने से व्यक्ति सत्य की प्राप्ति कर सकता है। रजनीश ने ध्यान को विभिन्न सोपानों में बाँटा है, जैसे कि साधना सोपान, ध्यानोपलब्धि और साधना सूत्र। ध्यान में प्रवेश के लिए कई सक्रिय विधियों का भी उल्लेख किया गया है, जैसे कुण्डलिनी ध्यान, नटराज ध्यान, और सामूहिक प्रार्थना ध्यान। साधकों के लिए ध्यान की विभिन्न विधियों को सीखना और अपनाना महत्वपूर्ण है। रजनीश ने साधकों को केवल तीन नियम दिए हैं: गेरुआ वस्त्र पहनना, भगवान की माला धारण करना, और नियमित रूप से ध्यान करना। ध्यान को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। पाठ में अनुभवों की चर्चा की गई है जो साधकों को ध्यान के दौरान होती हैं, जैसे शरीर का अनुभव न होना, विभिन्न मानसिक और शारीरिक अनुभूतियाँ, और ध्यान की प्रक्रिया में आने वाली चुनौतियाँ। ध्यान के प्रयोग के दौरान साधकों को अपने अनुभवों को स्वीकारने और उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के देखने की सलाह दी गई है। इस प्रकार, ध्यान योग का यह पाठ साधकों को ध्यान की गहराइयों में जाने और आत्मज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।


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