जैन धर्म और दर्शन | Jain Dharma Aur Darshan

- श्रेणी: जैन धर्म/ Jainism धार्मिक / Religious
- लेखक: प्रमाणसागर जी महाराज - Pramansagar Ji Maharaj
- पृष्ठ : 299
- साइज: 13 MB
- वर्ष: 1996
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दो शब्द :
प्रस्तुत पाठ में जैन धर्म और दर्शन की गहराई से विवेचना की गई है। लेखक ने जैन दर्शन को एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है और इसे जीवन के विभिन्न पहलुओं से जोड़ते हुए बताया है कि यह केवल सिद्धांतों का संग्रह नहीं, बल्कि एक व्यवहारात्मक मार्ग है। जैन दर्शन के चार प्रमुख स्तंभ - अहिंसा, अनेकांत, स्थाद्वाद, और अपरिग्रह - पर जोर दिया गया है, जिन्हें जीवन में अपनाने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति में सहायता मिलती है। लेखक ने यह भी स्पष्ट किया है कि जैन धर्म और दर्शन का मूल उद्देश्य जीवन के दुःखों को समाप्त करना है। दर्शन तर्क और विचार के माध्यम से सत्ता का विश्लेषण करता है, जबकि धर्म उस तत्व को प्राप्त करने का व्यावहारिक उपाय है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। पाठ में यह भी बताया गया है कि जैन साहित्य की भाषा और जटिलता के कारण नई पीढ़ी को इससे लाभ उठाने में कठिनाई होती है। इसलिए, आधुनिक संदर्भ में जैन दर्शन की व्याख्या की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। लेखक ने अपनी कृति के माध्यम से प्राचीन आचार्यों के विचारों को आज के संदर्भ में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, ताकि पाठक आसानी से समझ सकें। इस कृति का उद्देश्य जैन धर्म और दर्शन की वैज्ञानिकता को उजागर करना है। लेखक ने अपनी साधना और अनुभवों के आधार पर इस पुस्तक को लिखा है, जिससे यह पाठकों के लिए अधिक प्रभावी और उपयोगी बन सके। अंत में, लेखक ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है, जिनके आशीर्वाद से यह कार्य संभव हुआ।
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