आत्मबोध | Aatmbodh by


दो शब्द :

इस पाठ में मानवता की सृष्टि और उसके विकास के संदर्भ में गहन विचार किया गया है। प्रारंभ में मनुष्य का मस्तिष्क अत्यंत शुद्ध और तरल बताया गया है, जिसमें चैतन्य की पूर्णता थी। समय के साथ, मनुष्य के पापों और बुराइयों के कारण उसका मस्तिष्क कठोर और मलिन होता चला गया। भगवान शंकराचार्य ने इस स्थिति को देखकर साधारण लोगों में आत्मबोध का संचार करने के लिए 'आत्मबोध' नामक ग्रंथ की रचना की। पाठ में यह बताया गया है कि जैसे-जैसे पापों का विनाश होगा, अंतःकरण का अंधकार मिटेगा और मस्तिष्क पुनः तरलता प्राप्त करेगा। आत्मज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है, और यह ज्ञान तप और साधना के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। यहां ज्ञान को मुख्य साधन बताया गया है, क्योंकि बिना ज्ञान के मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसके अलावा, पाठ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि संसार का भौतिक रूप और उसके विभिन्न रूप केवल अविद्या के कारण हैं। जैसे कि स्वप्न में जो सत्य प्रतीत होता है, वह जाग्रत अवस्था में असत्य हो जाता है, उसी प्रकार सांसारिक जीवन भी स्वप्न के समान है। वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त करने पर ही आत्मा की शुद्धता को समझा जा सकता है। अंत में, यह विचार किया गया है कि आत्मा शुद्ध और नित्य है, और वह विभिन्न उपाधियों के कारण भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है। जैसे कि स्फटिक का रंग अन्य पदार्थों के साथ मिलकर बदलता है, वैसे ही आत्मा भी पंचकोशों के साथ मिलकर भिन्न-भिन्न रूप में दिखती है। इस प्रकार, पाठ आत्मा, ज्ञान और मोक्ष के गहन तात्त्विक पहलुओं पर प्रकाश डालता है।


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