ब्रह्मसूत्र भाष्यम (प्रथमो भाग) | Brahmsutrabhashyam (part1)

- श्रेणी: ग्रन्थ / granth संस्कृत /sanskrit
- लेखक: श्री शंकराचार्य - Shri Shankaracharya
- पृष्ठ : 326
- साइज: 13 MB
- वर्ष: 1910
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दो शब्द :
इस पाठ में भारतीय दर्शन के एक महत्वपूर्ण विषय, विशेषकर अद्वैत वेदांत पर चर्चा की गई है। यह पाठ ब्रह्म, आत्मा और जगत के संबंध को समझाने का प्रयास करता है। इसमें विभिन्न प्रमाणों और शास्त्रों का उल्लेख किया गया है, जो दर्शाते हैं कि कैसे अद्वैत वेदांत में ब्रह्म को सर्वोच्च वास्तविकता माना जाता है। पाठ में ब्रह्म के विभिन्न स्वरूपों, जैसे कि नित्य, अचेतन, और अमृतत्व पर चर्चा की गई है। यह बताया गया है कि ब्रह्म का अनुभव कैसे किया जा सकता है और आत्मा का ब्रह्म से संबंध क्यों महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, विभिन्न विचार धाराओं का विश्लेषण किया गया है, जैसे कि जिज्ञासा, कर्म, और उनके प्रभाव। अध्याय में अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न तर्कों और विचारों का उपयोग किया गया है। पाठ के अंत में, ब्रह्म के अद्वितीय स्वरूप और आत्मा के मोक्ष से जुड़े विचारों का समावेश किया गया है, जो दर्शाते हैं कि कैसे वेदांत के सिद्धांत जीवन के गहरे प्रश्नों का उत्तर प्रदान करते हैं। यह पाठ दर्शाता है कि ब्रह्म और आत्मा का ज्ञान न केवल दार्शनिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह व्यक्तित्व के विकास और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी आवश्यक है।
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