समकालीन हिंदी आलोचना | Samkaaleen Hindi Alochana

By: परमानन्द श्रीवास्तव - Pramanand Shrivastav
समकालीन हिंदी आलोचना | Samkaaleen Hindi Alochana by


दो शब्द :

इस पाठ का सारांश समकालीन हिंदी आलोचना की विकास यात्रा और उसके महत्वपूर्ण पहलुओं पर केंद्रित है। इसमें प्रमुख रूप से साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित आलोचनात्मक निबंधों के संकलन का उद्देश्य स्पष्ट किया गया है, जिसमें पिछले कुछ दशकों में हिंदी आलोचना में हुए उल्लेखनीय योगदान को प्रस्तुत किया गया है। पाठ में यह बताया गया है कि आलोचना का यह चयन न केवल पूर्ववर्ती आलोचकों के विचारों को समाहित करता है, बल्कि समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में गहरी संवेदना और रचनात्मकता की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। पाठ में विभिन्न आलोचकों के विचारों का उल्लेख किया गया है, जैसे कि शमशेर, मुक्तिबोध, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह, जिन्होंने साहित्य की मूल्यांकन और विश्लेषण की अपनी-अपनी पद्धतियाँ विकसित की हैं। आलोचना की गुणवत्ता को सहमति या असहमति से नहीं, बल्कि ठोस तर्कों पर निर्भर बताया गया है। यह भी कहा गया है कि आलोचना का उद्देश्य केवल सिद्धांतों का निरूपण नहीं, बल्कि रचनात्मकता और संवेदनशीलता के साथ साहित्य की गहराई में उतरना है। इसके अलावा, पाठ में यह उल्लेख किया गया है कि आलोचना का महत्त्व रचना के भीतर निहित जीवन अनुभवों के पुनः पाठ से उत्पन्न होता है। आलोचना केवल बाहरी रूप से नहीं, बल्कि रचना के आंतरिक अनुभवों के माध्यम से वास्तविकता को समझने का माध्यम है। अंत में, यह स्पष्ट किया गया है कि समकालीन हिंदी आलोचना की चुनौतियों और समस्याओं पर विचार करना आवश्यक है, ताकि साहित्य और आलोचना के बीच की सीमाएँ समझी जा सकें।


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