दो शब्द :

इस पाठ में भारतीय दर्शन के मूल सिद्धांतों और इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। मनुष्य की जीवन रक्षा और ज्ञान की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए, यह कहा गया है कि मनुष्य केवल अपनी वर्तमान आवश्यकताओं के लिए नहीं, बल्कि भविष्य के परिणामों के बारे में भी सोचता है। इस प्रक्रिया में बुद्धि और तर्क की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जिसे 'दर्शन' कहा जाता है। भारतीय दर्शन को 'फिलासफी' के रूप में समझा गया है, जो जीवन के अर्थ, संसार, और ईश्वर के संबंध में गहन प्रश्नों का उत्तर खोजने की कोशिश करता है। पाठ में यह स्पष्ट किया गया है कि भारतीय दर्शन में अनेक शाखाएँ हैं, जो विभिन्न ज्ञान के क्षेत्रों की खोज करती हैं, जैसे कि तत्व-विज्ञान, प्रमाण-विज्ञान, नीति-विज्ञान, और सौंदर्य-विज्ञान। पश्चिमी दर्शन की तुलना करते हुए, यह बताया गया है कि कैसे समय के साथ ज्ञान का विस्तार हुआ और विभिन्न विज्ञानों का विकास हुआ, जो मनुष्य और प्रकृति के विशेष पहलुओं पर केंद्रित हैं। अंत में, यह उल्लेख किया गया है कि समाज-विज्ञान और मनोविज्ञान भी अब 'फिलासफी' से अलग-अलग विषयों के रूप में स्थापित हो गए हैं। इस प्रकार, पाठ भारतीय दर्शन की व्यापकता, उसके विकास, और उसकी विशेषताओं को प्रस्तुत करता है, जो न केवल भारत में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण हैं।


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