पन्ना धायल | Panna Dhayal

By: शिवप्रसाद 'चारण' - Shivprasad 'Charan'
पन्ना धायल | Panna Dhayal by


दो शब्द :

यह पाठ "राजस्थानी वीरों का संघष" नामक ऐतिहासिक नाटक का एक अंश है, जिसमें मेवाड़ के वीरों की साहसिकता और संघर्ष को दर्शाया गया है। नाटक में विक्रमादित्य और कम सिंह के बीच संवाद है, जहां विक्रमादित्य अपने कर्तव्यों को भुलाकर राजद्रोह कर रहा है और कम सिंह उसे उसकी गलती के लिए दंडित करने का प्रयास कर रहा है। कम सिंह मेवाड़ के रक्षक की भूमिका में है और वह विक्रमादित्य को सिंहासन से उतारने का प्रयास करता है। सभा के सदस्यों के बीच विक्रमादित्य के प्रति नाराजगी और विद्रोह की भावना भी व्यक्त होती है। कम सिंह अपनी वीरता और मेवाड़ के प्रति अपनी निष्ठा का प्रमाण प्रस्तुत करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने को तैयार है। नाटक में अन्य पात्र जैसे मालोजी, शीतलसेनी और अन्य वीर भी शामिल हैं, जो मेवाड़ की रक्षा के लिए एकजुट होते हैं। शीतलसेनी अपने प्रेम और समर्पण के माध्यम से मालोजी को प्रेरित करती है, जबकि अन्य वीरों का साहस और संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि वे किसी भी विपत्ति का सामना करने के लिए तैयार हैं। इस प्रकार, यह नाटक वीरता, निष्ठा और मातृभूमि की रक्षा के लिए संघर्ष की प्रेरणा देता है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की भावना को भी दर्शाता है।


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