राजनीती शास्त्र | Rajneeti Shastra

By: श्री प्राणनाथ विद्यालंकार - Shri Pranath Vidyalakarta


दो शब्द :

इस पाठ में राष्ट्र के स्वरूप, उसके विकास और संरचना के संबंध में चर्चा की गई है। लेखक श्रीप्राशनाथ विद्यालंकार ने राष्ट्र के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया है। उन्होंने बताया है कि राष्ट्र का गठन जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्र, संगठन, शासक और शासित के बीच के संबंधों पर निर्भर करता है। राष्ट्र एक जीवित प्राणी के समान है, जिसका विकास एक स्थान पर बिछाए गए बीज की तरह होता है। यदि राष्ट्र की नींव मजबूत हो, तो वह उन्नति कर सकता है। इसके विपरीत, यदि उसकी संरचना कमजोर है, तो वह अवनति की ओर बढ़ सकता है। लेखक ने यह भी बताया है कि राष्ट्र का जीवन सदाचार और नैतिकता पर निर्भर करता है, और किसी भी राष्ट्र की पहचान उसके सद्गुणों से होती है। राजनीति में राष्ट्र की भूमिका को समझने के लिए, लेखक ने विभिन्न विचारधाराओं का उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि राष्ट्र की संरचना में शासक और शासित के बीच का भेद महत्वपूर्ण है। यदि यह भेद समाप्त हो जाता है, तो अराजकता उत्पन्न होती है। इसके अलावा, लेखक ने यह भी उल्लेख किया है कि राष्ट्र का विकास समय के साथ चलता है और विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार बदलता है। उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरणों के माध्यम से दिखाया है कि कैसे विभिन्न सभ्यताओं ने राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में योगदान दिया है। इस प्रकार, पाठ में राष्ट्र की परिभाषा, उसकी संरचना, विकास और राजनीति में उसकी भूमिका के बारे में विचार किया गया है। यह स्पष्ट है कि एक सफल राष्ट्र के लिए संगठन, नैतिकता और सही नेतृत्व आवश्यक हैं।


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