गोरा | Gora by


दो शब्द :

"गोरा" रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखी गई एक कहानी है, जिसमें मुख्य पात्र विनय भूषण है। कहानी का आरंभ श्रावण के महीने के एक प्रातःकाल से होता है, जब विनय अपने घर पर फुर्सत में है। उसने कॉलेज की सभी परीक्षाएँ पास कर ली हैं, लेकिन अब उसके पास कोई काम नहीं है। वह सोचता है कि उसे कुछ बड़ा करना चाहिए, लेकिन उसके मन में कोई स्पष्ट योजना नहीं है। इस बीच, एक भिखारी सड़क पर गा रहा है और विनय उसे बुलाना चाहता है, लेकिन तभी एक रईस की गाड़ी से दुर्घटना होती है। विनय उस गाड़ी से एक वृद्ध व्यक्ति और उसकी बेटी की मदद करता है। वृद्ध व्यक्ति और उसकी बेटी, जो बहुत सुंदर है, विनय का ध्यान आकर्षित करते हैं। विनय वृद्ध को अपने घर ले जाता है और उनकी बेटी उसकी मदद करने के लिए विनय को धन्यवाद देती है। विनय की पहली मुलाकात इस लड़की के साथ उसके मन में गहरी छाप छोड़ती है। वह उसकी सुंदरता और आत्मविश्वास को देखकर प्रभावित होता है। वृद्ध व्यक्ति का नाम परेश चंद्र भद्राचार्य है, और वह विनय से मित्रता की इच्छा व्यक्त करता है। विनय को उनके साथ बिताए गए समय में अपने आचरण में कुछ कमी महसूस होती है, और वह अपनी असमर्थता पर आत्म-आलोचना करता है। कहानी आगे बढ़ती है जब एक छोटा लड़का विनय के पास आता है और उससे संदेश लेकर आता है कि उसकी बहन ने उसे भेजा है। विनय को पता चलता है कि वह लड़का परेश बाबू का भाई है। इस प्रकार, विनय का एक नया संबंध बनता है, और कहानी में मित्रता, आत्म-खोज और मानवीय रिश्तों की गहराई को दर्शाया गया है। कहानी के अंत में, विनय के मन में उस लड़की के प्रति एक विशेष स्नेह विकसित होता है, और वह अपने जीवन में एक नई दिशा की खोज करने के लिए प्रेरित होता है। "गोरा" केवल एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह एक युवा व्यक्ति की आत्म-खोज की यात्रा भी है।


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