पाली भाषा और साहित्य | Pali Bhasha aur Sahitya

- श्रेणी: इतिहास / History भाषा / Language साहित्य / Literature
- लेखक: डॉ. इन्द्र चंद्र शास्त्री - Dr. Indra Chandra Shastri
- पृष्ठ : 499
- साइज: 16 MB
- वर्ष: 1965
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दो शब्द :
इस पाठ में पालि भाषा और साहित्य का विस्तृत विवेचन किया गया है। लेखक डॉ. इच्द्र चंद्र शास्त्री ने इस पुस्तक का उद्देश्य हिंदी में पालि से संबंधित मानक सामग्री प्रस्तुत करना बताया है, ताकि इसे पढ़ने वाले पाठक पालि भाषा और उसके साहित्य के बारे में गहन जानकारी प्राप्त कर सकें। पुस्तक में पालि भाषा के उद्भव, विकास और उसके साहित्य की विशेषताओं का अध्ययन किया गया है। पालि भाषा का नाम 'पालि' विभिन्न धारणाओं से जुड़ा है, जिसमें इसे गाँवों की भाषा, या बुद्धवचनों की सुरक्षा करने वाली भाषा के रूप में परिभाषित किया गया है। पाठ में पालि साहित्य को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है: पिटक साहित्य, जो बुद्ध के निर्वाणगकाल से पहले का है, और अनुपालि साहित्य, जो बाद के समय का है। पिटक साहित्य में 'त्रिपिटक' (सुत्तपिटक, विनयपिटक, और अभिधम्मपिटक) की चर्चा की गई है, जबकि अनुपालि साहित्य में विभिन्न महत्वपूर्ण रचनाओं का उल्लेख किया गया है, जैसे कि मिलिन्दपञ्जा और दीपबंस। इसके अलावा, पालि साहित्य को चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है: वंस-साहित्य, काव्य, अभिलेख-साहित्य और व्याकरण आदि। वंस-साहित्य में ऐतिहासिक ग्रंथों का उल्लेख है, जबकि काव्य में वर्णनात्मक और कथात्मक काव्य रचनाओं की चर्चा की गई है। अभिलेख-साहित्य में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का उल्लेख है और व्याकरण में विभिन्न व्याकरणिक नियमों का विस्तार से वर्णन किया गया है। पुस्तक में यह भी बताया गया है कि पालि भाषा का व्याकरण दो भागों में विभाजित है, जिसमें वर्णविज्ञान और रूप-निर्माण शामिल हैं। लेखक ने गाइगर के कार्यों का संदर्भ देते हुए बताया है कि पालि साहित्य और भाषा के अध्ययन के लिए यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो हिंदी भाषी पाठकों के लिए उपयोगी होगी। संक्षेप में, यह पाठ पालि भाषा और साहित्य की गहराई से जानकारी देता है और इसके ऐतिहासिक, साहित्यिक और व्याकरणिक पहलुओं की चर्चा
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