मीमांसा दर्शन | Mimamsa Darshan

By: श्री सम्पूर्णानन्द - Shree Sampurnanada


दो शब्द :

इस पाठ का उद्देश्य भारतीय दर्शन के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र, मीमांसा-दर्शन, का समालोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करना है। लेखक मंडन मित्र शास्त्री ने इस विषय पर लिखने की प्रेरणा अपने गुरु आचार्य पट्टाभिराम शास्त्री से प्राप्त की। मीमांसा दर्शन में विचारकांड, ज्ञानकांड और कर्मकांड के माध्यम से विभिन्न समस्याओं और सिद्धांतों का विवेचन किया गया है। लेखक ने अपने अनुभव और ज्ञान को साझा करते हुए इस विषय की जटिलता और गहराई को स्वीकार किया है। उन्होंने बताया कि मीमांसा दर्शन के अनेक ग्रंथ और विचारक इस क्षेत्र को समृद्ध करते हैं, लेकिन उन्हें एकत्रित करना और संक्षेप में प्रस्तुत करना कोई आसान कार्य नहीं है। पाठ में यह भी उल्लेख किया गया है कि इस ग्रंथ में मौलिकता का प्रश्न उठता है, और लेखक ने इसे विभिन्न विद्वानों की रचनाओं का संकलन मानते हुए अपनी दृष्टि से प्रस्तुत किया है। लेखक ने भाषा की कठिनाई का भी जिक्र किया है, यह कहते हुए कि दर्शन की गंभीरता के कारण इसे सरल भाषा में प्रस्तुत करना चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने इस ग्रंथ को उच्च शिक्षा के छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी मानते हुए इसे लिखने का प्रयास किया है। इसके अलावा, लेखक ने विभिन्न व्यक्तियों और शिक्षण संस्थानों का आभार व्यक्त किया है जिन्होंने उन्हें इस कार्य में सहयोग किया। अंत में, लेखक ने यह आशा व्यक्त की है कि यह ग्रंथ पाठकों की जिज्ञासा को शांत करेगा और मीमांसा दर्शन के प्रति रुचि बढ़ाएगा।


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