कबीर साहिब का साखी-सपग्रह | Kabir Sahib Ka Sakhi-Sangrah

- श्रेणी: काव्य / Poetry दार्शनिक, तत्त्वज्ञान और नीति | Philosophy
- लेखक: कबीरदास - Kabirdas
- पृष्ठ : 140
- साइज: 5 MB
- वर्ष: 1956
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दो शब्द :
इस पाठ में गुरु की महिमा और उनके प्रति श्रद्धा का विस्तृत वर्णन किया गया है। गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया गया है और उन्हें ज्ञान, प्रेम, और मुक्ति का स्रोत माना गया है। कबीर साहिब ने गुरु की सेवा और उनकी आज्ञा का पालन करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने बताया है कि गुरु के बिना आत्मा की मुक्ति संभव नहीं है और गुरु का सानिध्य व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। कबीर ने गुरु की महिमा को समझाते हुए कहा है कि गुरु की कृपा से ही व्यक्ति को सही मार्गदर्शन मिलता है और जीवन में सच्चे ज्ञान की प्राप्ति होती है। उन्होंने गुरु की उपासना को सर्वोपरि बताया है और कहा है कि गुरु के बिना सभी प्रयास व्यर्थ हैं। गुरु और शिष्य के संबंध को भी इस पाठ में महत्वपूर्ण रूप से दर्शाया गया है। गुरु को मित्र और मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अपने शिष्य को जीवन के कठिनाइयों से उबारने में सहायता करते हैं। कुल मिलाकर, यह पाठ गुरु की महिमा, उनकी भूमिका, और उनकी सेवा के महत्व को दर्शाता है, साथ ही यह भी बताता है कि सच्चे गुरु के संपर्क में आने से जीवन में कैसे सकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं।
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