भारतीय दर्शन | Bhartiya Darshan
- श्रेणी: Cultural Studies | सभ्यता और संस्कृति भारत / India
- लेखक: राधाकृष्ण - Docter Radhakrishn
- पृष्ठ : 684
- साइज: 33 MB
- वर्ष: 1966
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दो शब्द :
इस पाठ में भारतीय दर्शन के महत्व और उसकी गहराई पर चर्चा की गई है। लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि भौतिक विज्ञान और तकनीकी उन्नति के बावजूद मानव की आंतरिक आध्यात्मिकता में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं आया है। भारतीय विचारधारा, जो प्राचीन है, आज भी एक अद्वितीय और शक्तिशाली स्थान रखती है। लेखक का मानना है कि भारतीय दर्शन को केवल माया, कर्म, और त्याग जैसे संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि यह एक समृद्ध और गहन विचार प्रणाली है। लेखक ने यह भी बताया है कि भारतीय दर्शन का अध्ययन करते समय हमें इसकी प्राचीनता और जटिलता को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन के तत्व और उनके मूल सिद्धांत अन्य संस्कृतियों के दर्शन के समान महत्वपूर्ण हैं। भारतीय विचारधारा का अध्ययन करते समय इसे पश्चिमी मानकों से नहीं तोलना चाहिए, क्योंकि इसके अपने अद्वितीय संदर्भ और पृष्ठभूमि हैं। इसके अलावा, लेखक ने भारतीय दर्शन के विकास के इतिहास की जटिलता और इसके विभिन्न धाराओं की व्याख्या करते समय आने वाली चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने यह स्वीकार किया कि भारतीय दर्शन का इतिहास एक व्यापक और कठिन विषय है, और इस पर और अधिक गहन अध्ययन की आवश्यकता है। लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों को भारतीय दर्शन के मुख्य सिद्धांतों से अवगत कराने का प्रयास किया है, ताकि वे इस क्षेत्र में रुचि विकसित कर सकें। अंत में, लेखक ने इस कार्य को एक प्रारंभिक सर्वेक्षण के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसमें भारतीय विचारधारा की गहराई और भिन्नता को समझने की कोशिश की गई है।
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