आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना | Acharya Ramchandra Shukla Aur Hindi Aalochana

- श्रेणी: जीवनी / Biography साहित्य / Literature हिंदी / Hindi
- लेखक: रामविलास शर्मा - Ramvilas Sharma
- पृष्ठ : 240
- साइज: 9 MB
- वर्ष: 1959
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दो शब्द :
इस पाठ में डॉ. रामबिलास शर्मा ने हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण आलोचक, आचार्य रामचंद्र शुक्ल की भूमिका और उनके योगदान पर चर्चा की है। उन्होंने शुक्लजी को हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया है, जिनका स्थान प्रेमचंद और निराला के समान है। शुक्लजी ने आलोचना के माध्यम से सामंती संस्कृति का विरोध किया और देशभक्ति तथा जनतंत्र की साहित्यिक परंपरा को समर्थन दिया। शर्मा ने बताया कि शुक्लजी ने न तो भारतीय रूढ़िवाद को स्वीकार किया और न ही पश्चिमी व्यक्तिवाद को, बल्कि उन्होंने मानव जीवन की वास्तविकता पर आधारित नए साहित्यिक सिद्धांत स्थापित किए। शुक्लजी ने उपन्यास और कविता के माध्यम से समाज के वास्तविक जीवन को प्रस्तुत करने का प्रयास किया, और उन्होंने साहित्य प्रेमियों की साहित्यिक रुचि को परिष्कृत करने का कार्य किया। उन्होंने उपन्यास लेखन में पात्रों और घटनाओं के गहरे चित्रण और उनके विकास पर जोर दिया। शर्मा ने यशपाल और प्रोफेसर प्रकाशचंद्र गुप्ता जैसे विद्वानों की आलोचनाएँ भी पेश की हैं, जिनमें शुक्लजी की सीमाओं और उनके विचारों की संक्षिप्तता की चर्चा की गई है। अंत में, शर्मा ने शुक्लजी के दार्शनिक दृष्टिकोण और विज्ञान के प्रति उनके दृष्टिकोण पर भी रोशनी डाली है, यह स्पष्ट करते हुए कि शुक्लजी ने विज्ञान को साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान देने का प्रयास किया है। इस प्रकार, आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचनात्मक दृष्टि और उनके विचारों का महत्व हिंदी साहित्य में स्पष्ट रूप से उजागर होता है, जो उन्हें एक महान साहित्यकार के रूप में स्थापित करता है।
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