अध्यात्म अनुभव योगप्रकाश | Adhyatma Anubhav Yogaprakash

By: श्री चिदानंदजी महाराज - Shri Chidanandji Maharaj


दो शब्द :

इस पाठ में मूर्तिपूजा और नामजप के महत्व पर चर्चा की गई है। लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि मूर्तिपूजा की परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे अज्ञानता के खात्मे के लिए आवश्यक माना गया है। लेखक ने उदाहरणों के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि नाम का स्मरण केवल शब्दों तक सीमित है, जबकि मूर्ति का आकार और उसका दर्शन वास्तविकता का बोध कराते हैं। पाठ में यह भी बताया गया है कि कई नामी संतों और महात्माओं ने मूर्तिपूजा का समर्थन किया है और उनके अनुयायी भी इस परंपरा का पालन करते हैं। इसके अतिरिक्त, लेखक ने यह बताया है कि मनुष्य अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार ही आकार ग्रहण करता है, और इस प्रकार के विचार से यह भी सिद्ध होता है कि आकार और मूर्तियों का महत्व है। अंत में, लेखक ने पाठकों को यह सलाह दी है कि वे मूर्तिपूजा के महत्व को समझें और उसके प्रति अपनी दृष्टि को सकारात्मक रखें। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई संत या महात्मा नाम के प्रति ही ध्यान देने की बात कहता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने मूर्तिपूजा को नकारा है। इस प्रकार, पाठ में मूर्तिपूजा के महत्व को स्पष्ट करते हुए भक्ति और श्रद्धा के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया गया है।


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