मुर्दों का गाँव | Murdo ka Goan

By: धर्मवीर भारती - Dharmvir Bharati
मुर्दों का गाँव  | Murdo ka Goan by


दो शब्द :

इस पाठ में एक गाँव की भयावह स्थिति का वर्णन किया गया है, जहाँ अकाल और भूख के कारण लोग मर रहे हैं। गाँव के बारे में अफ़वाहें हैं कि वहाँ रात में भूखे कंकाल घूमते हैं। मुख्य पात्र अखिल और उसका साथी उस गाँव की स्थिति का पता लगाने के लिए जाते हैं। वे वहाँ पहुँचते हैं और देखते हैं कि गाँव में सड़ी-गली लाशें हैं, और चारों ओर दुर्गंध फैली हुई है। वहां एक कंकाल की पहचान होती है, जो निताई धीवर का है, जिसे भूख के कारण अपनी माँ की लाश को जलाना पड़ा था। फिर वे जुलाहे और जुलाहिन का भी जिक्र करते हैं, जो भूख से परेशान हैं। जुलाहिन एक दिन जड़ों को खोदते समय घायल हो जाती है और उसके पति उसे घर से निकाल देता है। वह जुलाहिन बाद में भूत बनकर कहे जाने लगती है। आखिर में, अखिल और उसका साथी गाँव में लाशों को एक गड्ढे में डालने का निर्णय लेते हैं और यह सोचते हैं कि जुलाहा और जुलाहिन की लाशें अब शांति से आराम करेंगी। पाठ का अंत इस विचार के साथ होता है कि भूख ने इंसानियत को कैसे नष्ट कर दिया है और यह एक गंभीर सामाजिक समस्या को उजागर करता है।


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