कर्म - योग | Karma-Yoga

- श्रेणी: Self-Help and Motivational | स्व सहायता पुस्तक और प्रेरक Vedanta and Spirituality | वेदांत और आध्यात्मिकता
- लेखक: स्वामी विवेकानंद - Swami Vivekanand
- पृष्ठ : 146
- साइज: 4 MB
- वर्ष: 1936
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दो शब्द :
यह पाठ स्वामी विवेकानंद के विचारों पर आधारित है, जिसमें उन्होंने कर्मयोग की विशेषताओं और उसके महत्व को समझाया है। स्वामी विवेकानंद ने बताया है कि कर्म का अर्थ केवल कार्य करना नहीं है, बल्कि यह हमारे चरित्र का निर्माण करता है। कर्म का फल हमारे पूर्वकर्मों से जुड़ा होता है, और जीवन का सही ध्येय सुख नहीं, बल्कि ज्ञान है। उन्होंने यह भी कहा कि मानव जीवन में सुख और दुख दोनों शिक्षक के रूप में कार्य करते हैं। सुख और दुख के अनुभव से मनुष्य अपने चरित्र का निर्माण करता है, और हर अनुभव उसे कुछ सिखाता है। स्वामी विवेकानंद ने यह भी स्पष्ट किया कि ज्ञान मनुष्य के भीतर ही निहित है, और उसे खोजने के लिए अपने भीतर के आवरण को हटाना आवश्यक है। उन्होंने यह विचार भी प्रस्तुत किया कि मनुष्य का चरित्र उसके कर्मों का परिणाम है। महान व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि कठिनाइयों और दुखों ने उन्हें सिखाया और उनके चरित्र का निर्माण किया। स्वामी विवेकानंद ने कर्मयोग को आत्मोत्थान का मार्ग बताया, जिसमें मनुष्य अपनी आंतरिक शक्तियों को पहचानता है और उन्हें बाहरी दुनिया में व्यक्त करता है। उन्होंने यह बताया कि मनुष्य अपनी इच्छाओं के अनुसार कर्म करता है, और उसे यह समझना चाहिए कि प्रत्येक कर्म उसकी आत्मा के विकास का एक साधन है। आखिर में, स्वामी विवेकानंद ने यह कहा कि हमें कर्म करना सीखना चाहिए, और यह समझना चाहिए कि कर्म का उद्देश्य हमारी आंतरिक शक्ति को जागृत करना है।
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