आत्मजयी | Atmajayi

By: कुँवर नारायण - Kunvar Narayan


दो शब्द :

"भालमनयीं" पाठ में नचिकेता नामक पात्र के माध्यम से मानव जीवन की गहनता और मृत्यु के साथ उसके संबंधों का विश्लेषण किया गया है। नचिकेता एक अत्यंत विचारशील व्यक्ति है, जो केवल भौतिक सुखों को अस्वीकार कर देता है और मृत्यु की गहराइयों में जाकर जीवन के सार्थकता की खोज करता है। पाठ में यह बताया गया है कि नचिकेता का संघर्ष केवल व्यक्तिगत सुख की प्राप्ति के लिए नहीं है, बल्कि वह एक उच्चतर सत्य की खोज में लगा है। वह जीवन और मृत्यु के अर्थ को समझने के लिए यमराज से संवाद करता है, जिससे उसे ज्ञान और आत्मा की अमरता का बोध होता है। इसमें यह भी कहा गया है कि नचिकेता की दृष्टि में, आत्मा और शरीर के बीच का भेद महत्वपूर्ण है। भारतीय दर्शन में आत्मा को शाश्वत और अमर माना गया है, जबकि शरीर क्षणिक है। नचिकेता की यात्रा केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं है, बल्कि यह मानवता के लिए एक प्रेरणा भी है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जीवन का असली मूल्य क्या है। पाठ के अंत में यह विचार प्रस्तुत किया गया है कि जीवन की कठिनाइयों और मृत्यु के भय को समझने से ही हम अपने अस्तित्व का सही अर्थ जान सकते हैं। नचिकेता का अनुभव हमें यह सिखाता है कि जीवन में केवल भौतिक सुखों का पीछा करने से कुछ नहीं होता, बल्कि आत्मिक उन्नति और ज्ञान की प्राप्ति से ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य पूरा होता है। इस प्रकार, "भालमनयीं" पाठ में नचिकेता की कहानी के माध्यम से मृत्यु, जीवन, ज्ञान और आत्मा के गहरे संबंधों को उजागर किया गया है।


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