गीता का राजविद्या | Geeta Ka Rajvidya

By: स्वामी रामसुखदास - Swami Ramsukhdas


दो शब्द :

इस पाठ में श्रीभगवद्गीता के सातवें, आठवें और नवें अध्यायों की विस्तृत व्याख्या की गई है। यह बताया गया है कि भगवद्गीता एक गहन ज्ञान का भंडार है, जिसे समझना कठिन हो सकता है। इसे समझने के लिए विद्वानों की बुद्धि भी कई बार असमर्थ होती है। साधक इस ग्रंथ का अध्ययन करके अपने साधना मार्ग को स्पष्ट कर सकते हैं और भगवत्-प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं। पुस्तक का उद्देश्य यह है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति, सम्प्रदाय या देश से हो, भगवान की ओर चलकर भगवत्-प्राप्ति कर सकता है। पाठकों को इस पुस्तक का अध्ययन, मनन और चिंतन करने की सलाह दी गई है ताकि वे साधना में पूर्ण तत्परता से जुट सकें। सातवें अध्याय में भगवान ने अपने समग्र रूप का वर्णन करते हुए बताया है कि वह सबका मूल कारण हैं। यहाँ अपरा और परा प्रकृति का वर्णन किया गया है और यह भी बताया गया है कि भगवान के सिवाय कोई और कारण नहीं है। इसके अलावा, भक्तों की महिमा और उनके विभिन्न प्रकार के गुणों का भी वर्णन किया गया है। आठवें अध्याय में भगवान के सगुण और निराकार रूप की उपासना के फल का वर्णन किया गया है। नवें अध्याय में ज्ञान और विज्ञान का विस्तृत वर्णन किया गया है, जिसमें भक्तों के द्वारा भगवान की उपासना, उनके प्रेम और भक्ति की महत्ता को उजागर किया गया है। इस प्रकार, पाठ में भगवद्गीता के गूढ़ रहस्यों को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे साधक और भक्त अपने जीवन में इसे लागू कर सकें।


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