भारतीय पुरालिपि | Bhartiya Puralipi

By: राजबली पाण्डेय - Rajbali Pandey


दो शब्द :

इस पाठ का मुख्य विषय पुरालिपि-शास्त्र है, जो लेखन-कला का अध्ययन करता है। लेखन-कला मानवता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान और संस्कृति के संरक्षण का एक साधन है। भारतीय पुरालिपि पर एक पुस्तक की आवश्यकता पहले से महसूस की जा रही थी, जिसके कारण इसका लेखन किया गया है। पिछले कुछ दशकों में इस क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण खोजें हुई हैं, जैसे मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाइयाँ, जिन्होंने भारतीय लेखन-कला के प्राचीनता और उसकी उत्पत्ति से संबंधित धारणाओं को चुनौती दी है। पुस्तक का उद्देश्य भारतीय लेखन-कला का इतिहास प्रस्तुत करना है, विशेषकर प्राचीन काल से लेकर सन् 1200 ई. तक। इसे दो भागों में बाँटा गया है। पहले भाग में भारतीय पुरालिपि-शास्त्र के विभिन्न पहलुओं का विवेचन किया गया है, जिसमें लेखन-कला की प्राचीनता, लिपियों के प्रकार, लेखन सामग्री, लेखन पद्धति, अभिलेखों के प्रकार, तथा तिथि-अंकन की विधियों का विवरण शामिल है। पुस्तक में विभिन्न विद्वानों के मतों का उल्लेख किया गया है जो भारतीय लेखन-कला की उत्पत्ति और विकास पर आधारित हैं। इसमें प्राचीन भारतीय साहित्य और अनुश्रुतियों का भी उल्लेख है जो लेखन-कला की प्राचीनता को सिद्ध करते हैं। इसके अतिरिक्त, पुस्तक में पाद-टिप्पणियों के माध्यम से विभिन्न ग्रंथों और स्रोतों का संदर्भ दिया गया है, जिससे विषय को और स्पष्टता मिलती है। इस प्रकार, यह पुस्तक पुरालिपि-शास्त्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है और आशा की जाती है कि भविष्य में इस दिशा में और कार्य किया जाएगा।


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