थे वाक्यपदीय (ब्रह्मा कंदा) | The Vakyapadiya (Brahma Kanda)

- श्रेणी: दार्शनिक, तत्त्वज्ञान और नीति | Philosophy भारत / India संस्कृत /sanskrit
- लेखक: भर्तृहरि - Bhartrahari
- पृष्ठ : 192
- साइज: 4 MB
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दो शब्द :
इस पाठ में संस्कृत व्याकरण और उसकी विभिन्न परिभाषाएँ, सिद्धांत, और विचार प्रस्तुत किए गए हैं। यह महाव्याकरण और अन्य प्राचीन भारतीय दार्शनिक दृष्टिकोणों को संदर्भित करता है। पाठ में एक महत्वपूर्ण अवधारणा "प्रणव" (ॐ) का वर्णन किया गया है, जिसे ब्रह्मा का प्रतीक माना जाता है। यह बताया गया है कि प्रणव का महत्व और उसके द्वारा सभी वेदों और शास्त्रों में व्यक्त किए गए ज्ञान के साथ उसका संबंध कैसे है। पाठ में यह भी उल्लेख किया गया है कि विभिन्न दर्शन, जैसे परमाणुकरणवाद और प्रधान कारणवाद, कैसे एक दूसरे के साथ संतुलित या विरोधाभासी हो सकते हैं। इसके अलावा, यह भी चर्चा की गई है कि कैसे शब्द और उनका अर्थ, ध्वनि और अभिव्यक्ति के माध्यम से ब्रह्म तक पहुँचने के साधन हैं। इसमें यह भी व्याख्या की गई है कि शब्द और ध्वनि की विभिन्न श्रेणियाँ और उनके उपयोग कैसे मानव अनुभव और ज्ञान के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। पाठ अंत में यह दर्शाता है कि कैसे ये तत्व एक दूसरे के साथ मिलकर एक समग्र दार्शनिक प्रणाली का निर्माण करते हैं, जो वेदों और शास्त्रों में निहित है। इस प्रकार, यह पाठ संस्कृत व्याकरण, दार्शनिक विचार और ब्रह्म के सिद्धांतों का एक गहरा विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
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