गृहस्थ में कैसे रहें | Grihasth Mein Kaise Rahen

By: स्वामी रामसुखदास - Swami Ramsukhdas


दो शब्द :

यह पाठ गृहस्थ जीवन के महत्व और उसके कर्तव्यों पर केंद्रित है। वर्तमान में गृहस्थ आश्रम की स्थिति चिंताजनक है, जिसमें लोग समस्याओं और तनाव के कारण दुखी हैं। इस संदर्भ में, पाठ में यह बताया गया है कि गृहस्थों को अपनी समस्याओं का समाधान पाने के लिए एक ऐसा मार्गदर्शन आवश्यक है, जो उन्हें उनके कर्तव्यों के पालन और दूसरों के अधिकारों की रक्षा में मदद कर सके। पाठ में गृहस्थ जीवन की चार आश्रमों की परंपरा का उल्लेख किया गया है, जिसमें गृहस्थ आश्रम को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। गृहस्थ को अपने परिवार की भलाई का ध्यान रखते हुए, भोग और अभिमान का त्याग कर एकजुटता से रहना चाहिए। एक सुखी गृहस्थ का जीवन वह होता है जहां परिवार में सभी सदस्य एक-दूसरे की भलाई का ध्यान रखते हैं और सभी का पालन-पोषण किया जाता है। विवाह का महत्व भी इस पाठ में समझाया गया है। यह बताया गया है कि विवाह केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि जीवन के विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाता है। गृहस्थ का प्रमुख धर्म है कि वह अपने परिवार, समाज और चारों आश्रमों के लिए जिम्मेदारियों का निर्वहन करे, जैसे अतिथि सत्कार, सेवा, और पूजा। पाठ में गृहस्थों के लिए कुछ महत्वपूर्ण उपाय भी दिए गए हैं, जैसे कि हिंसा से बचने के तरीके और पितृ ऋण से मुक्त होने के उपाय। यह भी बताया गया है कि गृहस्थ को अपने कर्मों का फल भोगने के लिए अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए, ताकि उन्हें पितृ ऋण से मुक्ति मिल सके। इस प्रकार, पाठ गृहस्थ जीवन के धर्म, कर्तव्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों का समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिससे पाठक यह समझ सके कि एक सफल और संतुलित गृहस्थ जीवन कैसे जीया जा सकता है।


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