सामान नागरिक संहिता | Samaan Nagarik Sanhita

By: मौलाना वहीदुद्दीन खान - Maulana Wahiduddin Khan


दो शब्द :

समान नागरिक संहिता का विचार भारत में स्वतंत्रता से पहले से ही चल रहा है, लेकिन यह अब भारतीय संविधान का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। संविधान के अनुच्छेद 44 में इसे शामिल किया गया है, जिसमें कहा गया है कि सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि, संविधान का विस्तार और जटिलता एक समस्या बन गई है। संविधान एक संक्षिप्त दस्तावेज होना चाहिए, जिससे सामान्य नागरिक भी उसे समझ सकें। भारत का संविधान सबसे लंबा है और इसमें कई धाराएं और उपधाराएं शामिल हैं, जिसके कारण इसमें समय-समय पर बड़े संशोधन होते रहते हैं। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में कहा था कि हर बात को संविधान में नहीं लिखा जा सकता। लेकिन इसके विपरीत, यह धारणा बन गई कि संविधान में अधिकतर चीजें लिखी जानी चाहिए। इसलिए, समान नागरिक संहिता की धारा भी विवाद का विषय बन गई है। नेहरू रिपोर्ट में समान नागरिक संहिता का विचार पेश किया गया था, जिसका विरोध विभिन्न धार्मिक समूहों द्वारा किया गया। इसके बाद, उच्चतम न्यायालय ने भी समान नागरिक संहिता के महत्व पर जोर दिया है। न्यायालय ने कहा कि यह राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक है, लेकिन इसे लागू करने का संबंध सरकार से है। संविधान की धारा 44 में समान नागरिक संहिता की बात की गई है, जबकि धारा 25 में धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। यह स्पष्ट है कि संविधान की मूल भावना के अनुसार, धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए। इसलिए, समान नागरिक संहिता को लागू करने की मांग करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ हो सकता है।


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