हिन्दी भाषा और नागरी लिपि का इतिहास | Hindi Bhasha Aur Nagari Lipi Ka Itihas

- श्रेणी: भाषा / Language शिक्षा / Education
- लेखक: बाल गोविन्द मिश्र - Baal Govind Mishra
- पृष्ठ : 257
- साइज: 76 MB
-
-
Share Now:
दो शब्द :
इस पाठ में लेखक बाल गोविन्द मिश्र ने भारतीय भाषाओं के अध्ययन और उनके विकास पर चर्चा की है। उन्होंने बताया कि भारत में भारतीय आयभाषाओं के तुलनात्मक और ऐतिहासिक अध्ययन में अभी तक काफी प्रगति नहीं हुई है। यह मुख्यतः इस विषय की उपेक्षा के कारण है, क्योंकि इसे महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र विषय के रूप में स्थान नहीं मिला है। लेखक ने उल्लेख किया कि कुछ विश्वविद्यालयों में इस दिशा में अच्छी व्यवस्था की गई है, जो एक सकारात्मक संकेत है। लेखक ने बताया कि हिंदी भाषा के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन करने के लिए कुछ प्रमुख ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं, लेकिन सामान्य पाठकों और छात्रों के लिए एक सरल और संगठित ग्रंथ की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से उन्होंने यह ग्रंथ लिखा है, जिसमें ग्यारह प्रकरण हैं। पहले दो प्रकरणों में भाषा और उसके विभिन्न स्वरूपों का विवेचन किया गया है। प्रमुख प्रकरणों में से एक में प्राचीन वैदिक युग से अपभ्रंश युग तक भारतीय आयभाषाओं का विकास दर्शाया गया है। लेखक ने भाषा के विकास के विभिन्न चरणों, बोलियों, और उनकी व्याकरणिक विशेषताओं का अध्ययन किया है। उन्होंने हिंदी की बोलियों के क्षेत्र, विस्तार और महत्व पर भी विचार किया और पिछले आठ सौ वर्षों की सांस्कृतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में हिंदी के विकास की रूपरेखा प्रस्तुत की। ग्रंथ में ध्वनियों की उत्पत्ति और वर्गीकरण, शब्द-रचना, पद-रचना, समासों और लिपियों का विवेचन किया गया है। लेखक ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि सभी उपलब्ध सामग्री और नवीनतम शोधों का उपयोग किया जाए। उन्होंने अपने गुरुओं और विद्वानों के प्रति आभार व्यक्त किया है, जिन्होंने उनके अध्ययन और शोध में मार्गदर्शन किया। अंत में, लेखक पाठकों से निवेदन करते हैं कि वे पुस्तक की त्रुटियों की ओर उनका ध्यान आकर्षित करें, ताकि अगली संस्करण में सुधार किया जा सके।
Please share your views, complaints, requests, or suggestions in the comment box below.